बात-से-बात: भूत कहाँ बहलते हैं....

बात-से-बात: भूत कहाँ बहलते हैं....

इसी तरह मेरी नानी का कहा मेरे दिमाग़ के मटके में उबलता रहता है -"बुराई तब तक भूत बनकर तुम्हें रुप बदल-बदल कर सताती रहेगी जब तक तुम उसे अच्छाई से नहीं बदलोगे...."

मुझे इस समय ये ख़बर सुनकर किशोर कुमार और नानी शिद्दत से याद आ रहे हैं कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 के ख़ूनी गुजरात फ़सादात में मरने वालों की भटकती हुई रूहों को सुकून देने के लिए फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का आदेश दिया है.

शायद सुप्रीम कोर्ट को एहसास हो गया है कि गुजरात धर्मनिरपेक्ष भारत के ज़मीर पर तब तक बोझ बना रहेगा जब तक नाइंसाफ़ी की चिता पर रखी हुए लाशों का इंसाफ़ के घी से अंतिम संस्कार नहीं हो जाता.

सिर्फ़ गुजरात ही क्यों?

भारत और पाकिस्तान कब बड़े होंगे...? और वे एक दूसरे के अलावा अपने-अपने नागरिकों से आख़िर कब माफ़ी माँगेंगे..? क़ानूनी दलीलों और झूठे दिलासों से ज़िंदा लोग तो बहल जाते हैं, पर भूत कहां बहलते हैं? वुसतुल्लाह ख़ान

भारत और पाकिस्तान कब बड़े होंगे...? और वे एक दूसरे के अलावा अपने-अपने नागरिकों से आख़िर कब माफ़ी माँगेंगे..? क़ानूनी दलीलों और झूठे दिलासों से ज़िंदा लोग तो बहल जाते हैं, पर भूत कहां बहलते हैं?

और सिर्फ़ गुजरात ही क्यों? भारत और पाकिस्तान में अभी भी बहुत सी लाशें हैं जिन्हें इतिहास के सीने से उतार कर बाइज़्ज़त दफ़न करने की ज़रूरत है.

जैसे वो हिंदू, सिख और मुसलमान जो वर्ष 1947 में लाखों की तादाद में मारे गए... उनकी भटकती हुई रूहें आज तक आपस के संबंधों पर रूप बदल-बदल कर वार कर रही हैं.

मगर ये बात न तो दिल्ली केंद्रीय सेक्रेटेरियट में बैठने वालों की ज़हन में आर ही है और न ही इस्लामाबाद के केंद्रीय सेक्रेटेरियट वाले इस पर ग़ौर करने में यक़ीन रखते हैं.

वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने तक जो लाखों बेगुनाह लोग मारे गए उसकी वजह से 71 का भूत आज तक कभी ज़िया-उल-हक़ तो कभी मुशरर्फ़ की तानाशाही की शक्ल में, तो कभी बलूचिस्तान में फ़ौजी हार की शक्ल में पाकिस्तान को चैन नहीं लेने दे रहा है.

वर्ष 1989 में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का अदालती क़त्ल उस वक़्त तक भटकती हुई रूह की तरह पाकिस्तानी सियासत से चिपका रहेगा जब तक उस केस का रीट्रायल यानी उसकी दोबारा सुनवाई नहीं हो जाती.

सच्चाई और सुलह की प्रक्रिया

वर्ष 1984 में दिल्ली में सिख दंगों के दौरान मारे गए लोगों के परिजन

वर्ष 1984 में दिल्ली समेत भारत के विभिन्न शहरों में जो हज़ारों सिख मारे गए, उनकी रूहें आज तक हर चुनाव के मौक़े पर भूत बन कर इंसाफ़ की दुहाई देती हैं.

फ़्रांस ने कैपटन ड्रिफ़्स की बेगुनाह साज़ा-ए-मौत को सौ बरस बाद रीट्रायल के ज़रिए अपने ज़मीर को आज़ाद करवा लिया. जर्मनी ने न्यूरमबर्ग ट्रायल्स के ज़रिए लाखों पीड़ित यहूदियों को मुआवज़ा देकर अपने राष्ट्रीय ज़मीर को नाज़ी भूत से आज़ाद करवा लिया.

नेलसन मंडेला ने सच्चाई और सुलह की प्रक्रिया के तहत गौरे और अश्वेत (जिन्हें वहाँ अनेक लोग ज़ालिम और निर्दोष की संज्ञा देते हैं) को गले लगाकर रोने और क्षमा कर देने का मौक़ा देकर दक्षिण अफ़्रीक़ा में रंगभेद की व्यवस्था को ज़मीन में सौ फ़ीट नीचे गाड़ने का इंतज़ाम कर दिया.

लेकिन भारत और पाकिस्तान कब बड़े होंगे......?

और वे एक दूसरे के अलावा अपने-अपने नागरिकों से आख़िर कब माफ़ी माँगेंगे......?

क़ानूनी दलीलों और झूठे दिलासों से ज़िंदा लोग तो बहल जाते हैं, पर भूत कहां बहलते हैं?

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