मध्य प्रदेश में मतदान के बहिष्कार के मायने
संभवत: मध्य प्रदेश में अब तक हुए विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में यह पहला अवसर है जब 38 मतदान केन्द्रों में एक भी वोट न पड़ा हो। विधानसभा चुनाव में जहां ऐसे केन्द्रों की संख्या छह थी वह लोकसभा में बढ़कर छह गुना से ज्यादा हो गई है। चुनाव आयोग ने जब बहिष्कार की वजह का पता किया तो स्थानीय समस्याओं के निराकरण न होने की बात सामने आई।
प्रदेश के 29 संसदीय क्षेत्रों में दो चरणों में मतदान हुआ। पहले चरण में 13 संसदीय क्षेत्रों में जहां 10 मतदान केन्द्रों पर एक भी वोट नहीं पड़ा वहीं दूसरे चरण में 16 संसदीय क्षेत्रों के 28 मतदान केन्द्रों में मतदाताओं ने बिजली पानी, सड़क, भवन निर्माण और तेंदू पत्ता की मजदूरी के भुगतान जैसे मुद्दों को लेकर मतदान का बहिष्कार किया गया। मतदान बहिष्कार का यह आंकड़ा तो बहुत आगे तक पहुंच सकता था मगर निर्वाचन दलों की सक्रियता के चलते इसे काफी हद तक रोक दिया गया।
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता उमा शंकर गुप्त मतदान बहिष्कार को लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं मानते है। उनका कहना है कि अगर समस्याओं का निराकरण नहीं हो रहा तो मतदाताओं को अपने विरोध का इजहार करना चाहिए। इतना ही नहीं निष्क्रिय जन प्रतिनिधियों के खिलाफ अपना विश्वास भी व्यक्त करना चाहिए न कि चुनाव का बहिष्कार। उन्हें लगता है कि बहिष्कार की यह प्रवृत्ति कुछ लोगों के भड़काने के कारण भी ग्रामीण अंचलों में बढ़ रही है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के प्रवक्ता क़े क़े मिश्रा का कहना है कि बहिष्कार की यह प्रवृत्ति नेताओं और राजनीति के प्रति घटते विश्वास का प्रमाण है। उनका कहना है कि दल और नेता निर्वाचित होने के बाद वादों पर खरे नहीं उतरते इसलिए मतदाता बहिष्कार जैसे अप्रिय कदम उठाते है। यह अघोषित अपराध की श्रेणी में आता है। मतदाताओं को अपनी समस्याओं को लेकर विरोध करना चाहिए और मताधिकार का इस्तेमाल जरूरी है।
एक दल के जिम्मेदार पदाधिकारी कहते है कि इस चुनाव में नेताओं पर उछला जूता और मतदान का बहिष्कार मतदाता के उस रोष को जाहिर करने वाली है जो वषों से ठगे जाने के बाद उपजा है। उनका कहना है कि नेता चुनाव में तो बड़े-बड़े वादे कर देते है, सपने दिखा जाते है मगर चुनाव जीतने अथवा हारने के बाद वे दोबारा पलट कर भी नहीं देखते है। नेताओं और दलों को मतदाताओं की अपेक्षाओं तथा उनसे किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में पहल करना पड़ेगी, नहीं तो आने वाले चुनाव में और भी बुरी परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर होना पड़ेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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