'सुरक्षित क्षेत्र में हुई भारी गोलाबारी'

'सुरक्षित क्षेत्र में हुई भारी गोलाबारी'

संयुक्त राष्ट्र ने सैटेलाइट से ये तस्वीरें उतारी हैं जिनमें तोप के गोलों के गिरने से बने बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई दे रहे हैं. यह वह इलाक़ा है जहाँ हज़ारों नागरिक श्रीलंका की सेना और विद्रोही तमिल छापामारों के बीच चल रही लड़ाई में फँसे हुए हैं.

तमिल विद्रोही पिछले कुछ समय से आरोप लगाते रहे हैं कि श्रीलंका की सेना उस क्षेत्र में भारी गोलाबारी कर रही है लेकिन श्रीलंका की सरकार इस आरोप को ग़लत बताती रही है.

अब भी सेना का यही कहना है कि तस्वीरों से ये साबित नहीं होता कि ये गड्ढे उनकी गोलाबारी से बने हैं, उनका ये भी कहना है कि तस्वीरों से ये साफ़ नहीं होता कि ये गोले वहाँ कब गिरे.

श्रीलंका के विदेश सचिव पालिता कोहाना का कहना है कि इस इलाक़े में तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ पिछले 15 वर्षों से लड़ाई चल रही है इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि गोले पिछले दिनों दागे गए हैं या श्रीलंका की सेना ने ही दागे हैं.

सेना का खंडन

श्रीलंका की सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर उदय नायाकरे ने इन आरोपों का खंडन किया है कि श्रीलंका की सेना ने सुरक्षित क्षेत्र में गोले दागे.

लड़ाई के कारण हज़ारों लोग बेघर हो गए

तमिल विद्रोहियों की ओर से इन तस्वीरों पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

श्रीलंका की सरकार का कहना है कि तमिल विद्रोहियों को पूरी तरह से परास्त किए जाने में थोड़ी सी कसर बाक़ी है, वे सिर्फ़ एक कोने में सिमट कर रह गए हैं.

यूनोसेट नाम के उपग्रह से ली गई तस्वीरों में ज़मीन पर बने ढेर सारे गड्ढे दिखाई देते हैं और संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यह नागरिकों के लिए सुरक्षित घोषित क्षेत्र का हिस्सा है.

संयुक्त राष्ट्र पहले भी श्रीलंका में आम नागरिकों की स्थिति पर चिंता जताता रहा है और श्रीलंका की सरकार ने भी पिछले सप्ताह घोषणा की थी कि सुरक्षित क्षेत्र में भारी हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र का मत बिल्कुल स्पष्ट है, उसके प्रवक्ता का कहना है कि सुरक्षित घोषित किए गए क्षेत्र में भारी तबाही हुई है और कम से कम 150 इमारतें ध्वस्त हो गई हैं, संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ये सारी तबाही पाँच फ़रवरी और 19 अप्रैल के बीच हुई है.

श्रीलंका में अब भी हज़ारों की तादाद में आम नागरिक शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं जबकि ढेर सारे लोग युद्धक्षेत्र में फँसे हुए हैं जिनकी सही संख्या न तो सरकार को पता है और न ही सहायता एजेंसियों को.

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