दक्षिण एशिया में अनावश्यक प्रभाव बढ़ा रहा है चीन : चिदम्बरम

चिदम्बरम ने एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में यह विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पिछले दिनों हुई एक बैठक में चीन ने बेवजह श्रीलंका मामले में चल रही अनौपचारिक चर्चा को पूर्वानुमान के आधार पर बाधित करने की कोशिश की। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था।"

उन्होंने कहा, "हाल के दिनों में भारत ने श्रीलंका को किसी तरह की कोई मदद नहीं दी है। इस बारे में जो भी खबरें आ रही हैं वह महज बकवास है। हमें पता है कि चीन श्रीलंका को हथियार व अन्य सामग्रियां उपलब्ध करवा रहा है। मेरे हिसाब से यह श्रीलंका की दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाने की अनावश्यक कोशिश है। चीन जो कुछ कर रहा है, हमें उससे सतर्क रहने की जरूरत है।"

चिदम्बरम ने लिट्टे और उसके प्रमुख प्रभाकरन से हथियार डालने और वार्ता आरंभ करने की अपील करते हुए कहा, "मैं प्रभाकरन और लिट्टे के कैडरों से अपील करता हूं कि वे हथियार डालकर नए सिरे से वार्ता आरंभ करें।"

श्रीलंका के संबंध में दक्षिण के राजनीतिक दलों द्वारा की जा रही तीखी बयानबाजियों के बारे में पूछे जाने पर चिदम्बरम ने कहा, "किसने क्या तीखी बयानबाजी की, इस बारे में मैं नहीं जानता। लेकिन सही सोच रखने वाला हर एक नागरिक लिट्टे और सामान्य तमिल नागरिकों का फर्क समझता है। हमारी चिंता नागरिकों को लेकर है। इस दिशा में श्रीलंकाई सरकार ने एक कदम उठाया है। कौन सही है और कौन गलत, यह तो इतिहास बताएगा।"

उल्लेखनीय है कि श्रीलंका सरकार ने सोमवार को आश्वासन दिया था कि उसकी सेना लिट्टे के खिलाफ लड़ाकू विमानों और भारी हथियारों का उपयोग नहीं करेगी। श्रीलंका सरकार ने इस कदम को संघर्ष विराम (सीजफायर) की जगह 'हाल्ट' नाम दिया था।

इस बारे में पूछे जाने पर चिदम्बरम ने कहा, "श्रीलंका का यह पहला महत्वपूर्ण कदम है। हमने श्रीलंका से लड़ाकू विमानों और भारी हथियारों का उपयोग नहीं करने का आग्रह किया था। अंतर्राष्ट्रीय दबाव और भारत का कूटनीतिक प्रयास रंग लाया। हमनें अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र की आवाज को मजबूती दी।"

प्रभारकन के बारे में भारतीय चिंता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "उसका क्या होगा, यह भविष्यवाणी तो मैं नहीं कर सकता। मैं आशा करता हूं वह जीवित रहे। हमारी मौजूदा चिंता श्रीलंका के तमिल नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा है। अभी भी 15 से 20 हजार नागरिक युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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