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श्रीलंका मेरी भी जान ले लेः करुणानिधि

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श्रीलंका मेरी भी जान ले लेः करुणानिधि

एलटीटीई के संघर्षविराम का बहिष्कार कर चुकी श्रीलंका सरकार से नाराज़ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए हैं.

श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में तमिल विद्रोहियों और श्रीलंका सरकार के बीच निर्णायक संघर्ष चल रहा है पर वहाँ 50 हज़ार से भी ज़्यादा आम तमिल नागरिक फंसे हुए हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव और अपीलों के बाद रविवार को एलटीटीई की ओर से संघर्षविराम की घोषणा कर दी गई थी पर श्रीलंका सरकार ने इस पेशकश को ठुकरा दिया था और संघर्ष जारी रखने की बात कही थी.

इससे क्षुब्ध तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि सोमवार की सुबह छह बजे तमिलनाडु की राजनीति के स्तंभ रहे अन्नादुरई की समाधि पर गए और अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया.

उन्होंने अनशन शुरू करते हुए कहा, "एलटीटीई के संघर्षविराम के बावजूद राष्ट्रपति राजपक्षे ने लोगों को मारना बंद नहीं किया है. अगर वो तमिल नागरिकों को मार रहे हैं तो वो मुझे भी मार दें. श्रीलंका की सरकार वहाँ के तमिलों की ही तरह मेरी भी जान ले ले."

पार्टी और पारिवारिक लोगों का कहना है कि उन्होंने किसी से इस बारे में सलाह भी नहीं की और ख़ुद ही तमिलों के मुद्दे पर क्षुब्ध होकर अनशन करने का फैसला ले लिया.

अनशन का असर

करुणानिधि की भूख हड़ताल ने राज्य और देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है. मुख्यमंत्री करुणानिधि एलटीटीई के संघर्षविराम के बावजूद राष्ट्रपति राजपक्षे ने लोगों को मारना बंद नहीं किया है. अगर वो तमिल नागरिकों को मार रहे हैं तो वो मुझे भी मार दें. श्रीलंका की सरकार वहाँ के तमिलों की ही तरह मेरी भी जान ले ले

एलटीटीई के संघर्षविराम के बावजूद राष्ट्रपति राजपक्षे ने लोगों को मारना बंद नहीं किया है. अगर वो तमिल नागरिकों को मार रहे हैं तो वो मुझे भी मार दें. श्रीलंका की सरकार वहाँ के तमिलों की ही तरह मेरी भी जान ले ले

चुनाव के दौर से गुज़र रहे भारत में तमिलनाडु राज्य की संसदीय सीटों के लिए 13 मई को मतदान होना है.

इस बार राज्य की राजनीति में श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा सबसे प्रमुखता से छाया हुआ है और विपक्षी नेता जयललिता सहित कई राजनीतिक मोर्चे करुणानिधि और उनकी पार्टी डीएमके को घेरते रहे हैं, उनकी आलोचना करते रहे हैं.

बीबीसी की तमिल सेवा के संवाददाता थांगावेल अपाचे ने कहा कि इस अनशन के बाद करुणानिधि राजनीतिक रूप से भी अपने प्रतिद्वंद्वियों के सामने मज़बूत होकर सामने आए हैं. करुणानिधि के अनशन से जहाँ केंद्र सरकार पर और प्रभावी क़दम उठाने का दबाव बनेगा वहीं विपक्षी दलों पर यह करुणानिधि का पलटवार भी है.

पर विशेषज्ञों की राय में करुणानिधि ने जो काम अब किया है उसे उन्हें इस मुद्दे पर कुछ समय पहले ही कर देना चाहिए था. इससे करुणानिधि अपने पक्ष में एक राजनीतिक माहौल भी बना पाते और सियासी हलकों में दबाव भी.

करुणानिधि के अनशन की घोषणा के बाद से ही बड़ी तादाद में उनके समर्थक अन्नादुरई की समाधि पर इकट्ठा होने लगे हैं. परिवार के लोगों ने उनकी अवस्था और स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है. लोगों को चिंता है कि अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे करुणानिधि की तबीयत अगर इस दौरान बिगड़ती है तो इससे हालात बिगड़ सकते हैं.

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