दक्षिण एशियाई बच्चे 'कम फुर्तीले'

शोधार्थियों का कहना है कि बच्चों के हृदय स्वास्थ्य से संबंधित अध्ययन से इस बात का पता चल सकता है कि क्यों युवावस्था में दक्षिण एशियाई लोगों में हृदय संबंधी और टाइप-दो मधुमेह की बीमारियाँ ज्यादा होती है.
इस शोध के दौरान बर्मिंघम, लंदन और लिस्सेटर में रहने वाले नौ और 10 वर्ष की उम्र के दो हज़ार बच्चों की दैनिक गतिविधियों का अध्ययन किया गया.
ब्रिटिश हार्ट फ़ाउण्डेशन के डॉक्टर माइक कनैपटन का कहना है कि इस उम्र के बच्चों में कसरत की गितिविधियों को स्तर बढ़ाने की ज़रुरत है.
अध्ययन से हमें यह समझने में मदद मिलेगी की क्यों दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी बच्चों में हृदय संबंधी और मुधेमेह की बीमीरी होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है ब्रिटिश हार्ट फ़ाउण्डेशन के डॉक्टर कैनपटन
| |
इस शोध में अफ़्रीकी-कैरीबियन मूल के और गोरे यूरोपीय बच्चों को भी शामिल किया गया था.
इस शोध में जिन बच्चों को शामिल किया गया था उनकी कमर पर एक छोटा उपकरण बाँध दिया गया था जो उनकी कसरत की मात्रा और हर दिन उनकी कदमताल को रिकॉर्ड करता रहा. इससे यह पता चला कि बच्चे कितना समय हल्के, भागदौड़ वाली और ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं जो बिना किसी दौड़-धूप के संपन्न होती है.
दौड़-भाग नहीं
दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी बच्चे ज्यादातर समय कंप्यूटर खेलों और टेलीविज़न देखने में बिताते में जिसमें दौड़-भाग शामिल नहीं रहता है.
इस शोध के प्रमुख डॉक्टर क्रिस्टोफ़र ओवेन ने कहा, "यह पहला अध्ययन है जो इस आयु समूह के विभिन्न जातीय समूह के बच्चों के बीच कसरत के स्तर का ठीक ठीक अध्ययन करता है. इससे पता चलता है कि दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कम फुर्तीले हैं."
वे कहते हैं, "शारीरिक गतिविधियों का स्तर बढ़ाना विशेष रूप से दक्षिण एशियाई मूल के बच्चों के लिए जरुरी है ताकि लंबे समय तक वे अपने स्वास्थ्य को बरक़रार रख सके."
ब्रिटिश हार्ट फ़ाउण्डेशन के डॉक्टर कैनपटन का कहना है, "इस अध्ययन से हमें यह समझने में मदद मिलेगी की क्यों दक्षिण एशियाई मूल के ब्रितानी बच्चों में हृदय संबंधी और मुधेमेह की बीमीरी होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है."
इस शोध में ब्रिटिश हार्ट फांउण्डेशन, द वेलकम ट्रस्ट और द नेशनल प्रिवेनशन रिसर्च इनिशिएटिव ने पैसा लगाया था.


Click it and Unblock the Notifications