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चुनाव पर क्या है माओवादियों का रवैया?

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चुनाव पर क्या है माओवादियों का रवैया?

नक्सली इलाक़ों में चुनाव करवाने के सरकारी प्रयास और माओवादियों की बहिष्कार की मांग इस प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को और भी मुश्किल बना देती है.

राज्य और माओवादियों के बीच जारी लड़ाई पिछले तीन सालों में और हिंसक हो गई है और मुख्य सड़क से नीचे जंगलों के बीच गाँव के गाँव ख़ाली पड़े हैं.

एक अनुमान के अनुसार बीजापुर और दंतेवाड़ा ज़िलों में ऐसे 600 से अधिक गाँव के बाशिंदे या तो सरकारी कैंपों में चले गए हैं या फिर अपनी जान बचा कर रातों-रात पास के राज्यों, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उड़ीसा भाग गए. ऐसे में चुछ बस्तियाँ जो आज भी आबाद हैं या दोबारा बस रही हैं वहाँ के लोगों का कहना है कि वह वोट नहीं देंगें.

बीस बीस साल के गंटल राजू और उनके दोस्त रामलू ने एक स्वर में कहा “हम वोट क्यों दें जब सरकार सुरक्षा तक नहीं कर पाई, जब पुलिस और सलवा जुडूम के लोगों ने आकर हमारे गाँव के चार लोगों की हत्या कर दी, पचास से साठ घर जला दिए."

ग़ुस्सा शांत होने पर गंटल राजू तीन साल की घटना को याद करते हुए कहते हैं, "सर, सोमवार शाम को एसपीओ लोग और पुलिस वाले आए, मेरी बहन के साथ बलात्कार किया, फिर उसके मुहँ में रिवाल्वर रख कर गोली मार दी, तीन और लोगों को मार दिया".

वोट न देने के फ़ैसले में सभी गंटल राजू के साथ हैं, पुजारन बसंती भी जिनके पति उसी घटना में मारे गए थे.

बीस साल की गंटर बेबी याद करती हैं उस समय को जब गर्भवती होने के बावजूद उन्हें घर-बार, गाय-बैल, खेत-अनाज छोड़ कर सिर्फ़ जिस्म पर मौजूद कपड़े में आंध्र प्रदेश भागना पड़ा था और जंगल में ही उन्हें डिलीवरी के कष्ट से गुज़रना पड़ा था.

  वोट का बॉयकाट सिर्फ़ एक अकेले नक्सलियों के ज़रिए नहीं किया जाता बल्कि एक बड़ा धन्ना सेठ वर्ग और उच्च माध्यम वर्ग भी अघोषित तौर पर मतदान का बहिष्कार करता है.   एन साईं बाबा का तर्क है कि

  वोट का बॉयकाट सिर्फ़ एक अकेले नक्सलियों के ज़रिए नहीं किया जाता बल्कि एक बड़ा धन्ना सेठ वर्ग और उच्च माध्यम वर्ग भी अघोषित तौर पर मतदान का बहिष्कार करता है.

बुज़ुर्ग पुस्पुल पुट्टी भी वोट बायकॉट करने के फ़ैसले में शामिल हैं हालाँकि पूछे जाने पर वो बताने लगते हैं की उन्होनें अब तक दो बार वोट दिया है लेकिन इस बार उनसे कोई वोट मांगने नहीं आया.

तीन साल पहले सरकार समर्थित नक्सल विरोधी कार्यक्रम सलवा जुडूम की शुरुआत के समय उजाड़ो गया गाँव हाल में ही स्वयमसेवी संस्था आदिवासी चेतना मंच के ज़रिए बसाया गया है.

पास की बस्ती के 75 वरषीय गुंडी लालाया भी किसी नेता के गाँव में नहीं आने और वोट न मांगने की बात करते हैं. ऐसी शिकायत लिंगागिरी के बाहर भी है उन शिवरों में भी जहाँ पहुंचना काफ़ी आसन है क्योंकि यह मुख्य सड़क के किनारे बसे हैं.

बीजापुर स्थित पत्रकार शेख़ इस्लामुद्दीन कहते हैं कि नक्सलियों ने फ़रमान जारी किया है कि अगर इस इलाक़े में कोई भी नेता प्रचार करने आएगा तो उसे बंधक बना लिया जाएगा.

चुनाव बॉयकाट

हमेशा से दीवारों पर लिखे गए नारों, पोस्टरों और पर्चों के ज़रिए जनता से चुनाव का बहिष्कार करने की मांग करने वाले माओवादियों ने इस बार बस्तर के अंदरूनी इलाक़ो में हज़ारों ग्रामीणों की एक सभा आयोजित की और बॉयकाट के घोषणा की.

प्रेस के एक समूह को एक स्थानीय नक्सली नेता से मिलने के लिए बुलाया गया जिनका कहना था कि वर्तमान प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में जनता का कुछ भला नहीं हो रहा है, चुनाव के बाद जनता का शोषण और बढ़ेगा इसीलिए वोट नहीं दिया जाना चाहिए.

ऐसी मांग पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में भी पर्चों और दीवारों पर दिखी मगर कहा जाता है कि वहां हाल में विद्रोहियों की ताक़त में आने वाली कमी के कारण इसका ख़ास असर शायद न हो.

हालाँकि उड़ीसा के मलकानगिरी में एक स्थानीय उम्मीदवार का गला कटा शव मिला- इस नक्सली घोषणा के साथ कि उसका यह हश्र उनका हुक्म न मानने का नतीजा है.

झारखंड

नक्सली दीवारों पर लिखे नारों और पेड़ों पर लगे पर्चों के ज़रिए जनता से चुनाव का बहिष्कार करने की मांग करते हैं. भारत के एक और अति माओवादी प्रभावित राज्य झारखंड में नक्सलियों ने चुनाव की घोषणा के बाद से ही ग्रामीण अंचल के स्कूलों और दूसरी सरकारी इमारतों को बारूद से उड़ाना शुरू कर दिया है ताकि सुरक्षा बलों को तैनात करने के लिए सुरक्षित ठिकाने न मिल पाएं.

पिछले कुछ सालों में उड़ीसा में विद्रोहियों के ज़्यादा मज़बूत होने से दक्षिणी उड़ीसा के कई भीतरी इलाक़ो में लोक सभा चुनाव के उम्मीदवार और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रचार तक के लिए जाने से कतरा रहे हैं.

माओवादी चिंतक एन साईं बाबा का तर्क है कि वोट का बॉयकाट सिर्फ़ एक अकेले नक्सलियों के ज़रिए नहीं किया जाता बल्कि एक बड़ा धन्ना सेठ वर्ग और उच्च माध्यम वर्ग भी अघोषित तौर पर मतदान का बहिष्कार करता है.

इस सवाल पर कि अगर सुरक्षा के डर से उम्मीदवार तक चुनावी छेत्रों में नहीं जा रहे तो नागरिकों की असुरक्षा की भावना कैसे दूर होगी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कहा कि दस दिनों में क्षेत्र के हर इलाक़े में जाना संभव नहीं, मगर इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता हर बूथ पर नज़र आएंगे.

कुछ दिन पहले आयोजित मुख्यमंत्री का बस्तर चुनावी रोड शो भी ज़्यादातर शहरी इलाक़ों तक ही सीमित रहा.

छत्तीसगढ़

कुछ महीनों पहले हुए छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के दौरान ऐसे ही हालात होने के बावजूद बस्तर में साठ प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ और क्षेत्र की बारह में से ग्यारह सीटें भाजपा के हाथ आईं. राज्य प्रशासन ने इसे बस्तर की जनता का नक्सलवाद के ख़िलाफ़ और सलवा जुडूम के पक्ष में दिया गया वोट बताया. दूसरी ओर नक्सलियों का कहना था कि यह चुनावी हेरा फेरी का नतीजा है.

आज ये देश अपने आप को प्रजातंत्र इसीलिए मान रहा है क्योंकि यहाँ समय समय पर चुनाव होते रहते हैं, चाहे स्कूल हो या न हो, शिक्षा का दूर दूर से वास्ता न हो, स्वस्थ्य सुविधा बिलकुल न हो लेकिन चुनाव ज़रूर हो   अरुंधती राय

 आज ये देश अपने आप को प्रजातंत्र इसीलिए मान रहा है क्योंकि यहाँ समय समय पर चुनाव होते रहते हैं, चाहे स्कूल हो या न हो, शिक्षा का दूर दूर से वास्ता न हो, स्वस्थ्य सुविधा बिलकुल न हो लेकिन चुनाव ज़रूर हो

वैसे छत्तीसगढ़ में ऐसा उदाहरण अब तक सामने नहीं आया लेकिन झारखंड जैसे इलाक़ों से वोट देने के कारण नक्सलियों के ज़रिए अंगूठा और हाथ काट दिए जाने के मामले सामने आए हैं.

मतदाताओं को मओवादियों के ज़रिए मतदान केंद्र तक न पहुँचने देने की बात तो आम है.

कांग्रेस नेता शंकर सोढ़ी का कहना है कि इस इलाक़े में इतने वोट कभी पड़ते ही नहीं थे जितने इस बार पड़े तो ज़ाहिर है की बोगस वोटिंग हुई है.

और भी लोग सवाल उठाते हैं कि जब नक्सलियों के डर से वोट पड़ते ही नहीं तो वोट का प्रतिशत इतना अधिक कैसे?

जगदलपुर स्थित मानवधिकार कार्यकर्ता प्रताप अग्रवाल मानते हैं कि नक्सली प्रभावित इलाक़ों में भी मतदाताओं की तादाद में बढ़ोतरी हुई है फिर भी उन्होंने कहा “हाँ मगर वह उतनी नहीं बढ़ी जितनी बताई जाती है."

प्रसिद्ध लेखिका अरुंधती राय का कहना है कि शासन चाहे किसी भी राजनितिक दल का हो, कॉंफ़्लिक्ट ज़ोन्स में चुनाव के मामले में हेरा फेरी जारी रहेगी. अरुंधती राय ने कहा "सरकारों को यह जताना भी तो है कि इन इलाक़ों में भी उन्हीं का सिक्का चलता है, आख़िर वो ये कैसे मान लें की वे इन इलाक़ों में घुस भी नहीं सकते."

शायद इसीलिए बड़े शहरों तक में पीने का साफ़ पानी मुहैया करने में असफल प्रशासन चुनाव करवाने दूरस्थ इलाक़ों तक पहुँचता है.

बिहार

बिहार ने चुनाव के दौरान नक्सली इलाक़ों पर पैनी नज़र रखने के लिए दो अतिरिक्त हेलीकाप्टर मंगाएँ हैं, छत्तीसगढ़ में ही नक्सल प्रभावित उत्तरी इलाक़ों के लिए किए गए इंतज़ामात के अलावा दक्षिणी क्षेत्र के पांच ज़िलों के लिए पांच हेलीकाप्टर की व्यवस्था की गई है.

अरुंधती राय विरोध का एक बहुत ऊंचा स्वर है. अरुंधती राय कहती हैं, "आज ये देश अपने आप को प्रजातंत्र इसीलिए मान रहा है क्योंकि यहाँ समय समय पर चुनाव होते रहते हैं, चाहे स्कूल हो या न हो, सिक्षा का दूर दूर से वास्ता न हो, स्वस्थ्य सुविधा बिलकुल न हो लेकिन चुनाव ज़रूर हो."

कुछ और जानकार कहते हैं कि इन इलाक़ों में बात अब बुनियादी सुविधाओं से कहीं आगे निकल गई है और अब तो वहां सवाल है नागरिक के सबसे मौलिक अधिकार, जीवन के अधिकार का जो राज्य के विरुद्ध हथियार उठाए समूह और राज्य के नाम पर बन्दूक़ ताने लोगों के दरमियान पिस रहा है.

कभी पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू होने वाला नक्सलवाद अब भारत के एक दर्जन से अधिक राज्यों में फैल चुका है हालांकि दशकों से बार बार चुनाव आयोजित होते रहे हैं.

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