'मुठभेड़ में नक्सली नहीं, ग्रामीण मरे थे'

बुधवार सुबह माओवादियों ने चुनाव ड्यूटी पर जा रहे सीआरपीएफ़ के जवानों पर हाइवे पर स्थित बरहनियाँ गाँव के पास हमला किया था. इसमें तीन लोग मारे गए थे और पाँच घायल हुए थे.
मरने वालों में सीआरपीएफ़ का एक जवान, एक ड्राइवर और एक उनका सहायक शामिल थे.
सीआरपीएफ़ के कमांडेंट आलोक राज ने बुधवार को दावा किया था कि मुठभेड़ में पाँच नक्सलवादी मारे गए हैं.
लेकिन जिन लोगों को सीआरपीएफ़ ने नक्सलवादी बताया था बाद में उनकी पहचान बरहनियाँ गाँव के निवासियों के रूप में हुई है.
मानवाधिकारों के लिए काम करने संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) के शशिभूषण पाठक ने बताया, " जिन लोगों को सीआरपीएफ़ के जवानों ने नक्सली बताकर मार डाला था वे नक्सली नहीं बल्कि आम ग्रामीण थे."
जिन लोगों को सीआरपीएफ़ के जवानों ने नक्सली बताकर मार डाला था वे नक्सली ने बल्कि आम ग्रामीण थे शशिभूषण पाठक, पीयूसीएल कार्यकर्ता
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मरने वालों में एक पिता-पुत्र भी शामिल हैं.
नाराज़गी
मुठभेड़ के नाम पर आम लोगों को मारे जाने की इस घटना के बाद से इलाक़े के लोगों में काफ़ी गुस्सा है.
इसका असर लोकसभा चुनाव के पहले चरण में भी देखा गया. यह आने वाले समय एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.
राज्य में हाल के दिनों में नक्सलवादी हमलों में तेज़ी आई है. माना जा रहा है कि चुनाव को देखते हुए उन्होंने हमले तेज़ कर दिए हैं.
गुरुवार को हुए पहले चरण के मतदान के दिन कई इलाक़ों में नक्सलवादियों ने बंद का आह्वान किया था.
कुछ समय पहले पीयूसीएल ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर राज्य के स्कूलों में पुलिसकर्मियों कोकैंप लगाने की अनुमति न दिए जाने की मांग की थी.
नक्सलवादियों ने लातेहार और पलामू में स्कूलों की कई इमारतों को सिर्फ़ इसलिए उड़ा दिया था क्योंकि वहाँ पुलिसकर्मी कैंप लगा रहे थे.


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