विदेशों की सेनाओं गोरखाओं की भर्ती न रोकने से अन्य देशों के माओवादी नाराज
राजशाही के खिलाफ 10 वर्षो तक जनयुद्ध का संचालन करते समय प्रचंड ने ब्रिटिश और भारतीय सेना में भाड़े के सैनिकों के रूप में गोरखाओं की 'शर्मनाक' भर्ती को रोकने का वादा किया था।
प्रचंड की इस वादा खिलाफी को लेकर अफगानिस्तान की भूमिगत माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने रिवोल्युशनरी इंटरनेशनल मूवमेंट (आरआईएम) सहित विश्व माओवादी समुदाय में नेपाल की माओवादी पार्टी के खिलाफ अभियान आरंभ कर दिया है।
नेपाली माओवादियों का विरोध करने के लिए लिखे एक खुले पत्र में अफगान माओवादी पार्टी ने कहा कि प्रधानमंत्री के माओवादी होने और रक्षा तथा वित्त सहित सभी महत्वपूर्ण मंत्रालय इनके पास होने के बावजूद नेपाल के नागरिक अफगानिस्तान और ईराक में आक्रमणकारी सेनाओं का हिस्सा हैं।
अफगान माओवादी संयुक्त राष्ट्र अभियानों और ब्रिटिश सेना के हिस्से के रूप में देश में गोरखाओं की तैनाती के विरोधी हैं। उन्होंने हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के रूप में भी सैकड़ों नेपालियों की नियुक्ति की आलोचना की है।
पत्र में कहा गया है कि पहले नेपाली केवल अमेरिकी सुरक्षा कंपनियों के लिए काम करते थे लेकिन अब वे कनाडा और पोलैंड की सेना के साथ भी काम कर रहे हैं।
अफगान माओवादियों ने आरआईएम और दक्षिण एशिया की माओवादी पार्टियों की समन्वय समिति सहित कई अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी यह मुद्दा उठाया।
ब्रिटिश रक्षा उपमंत्री केवेन जोंस के वर्तमान दौरे के कारण पूरी दुनिया के समाचार माध्यमों में माओवादी पार्टी के खिलाफ गुस्सा है। मंगलवार को काठमांडू पहुंचे जोंस की यात्रा का मकसद ब्रिटिश गोरखाओं के बारे में वार्ता करना है।
फरवरी में जान स्टैनली के नेतृत्व में आए संसदीय दल को ब्रिटिश सेना में गोरखाओं की भर्ती पर प्रतिबंध न लगाने का आश्वासन देने के कारण प्रचंड और उनकी पार्टी की अन्य देशों की माओवादी पार्टियों ने आलोचना की थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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