दंगों की कहानियां झूठी: गुजरात सरकार

Gujarat riots
नई दिल्ली। गुजरात दंगों के समय एक विशेष समुदाय की महिलाओं के साथ बलात्‍कार, मार-काट और तमाम बातें जिन्‍हें गैर सरकारी संगठन ने लोगों की समस्‍या के रूप में पेश किया, वो झूठी हैं। गुजरात सरकार का दावा है कि यह सब बातें कहानी मात्र हैं, जिन्‍हें झूठे हलफनामे बनाकर कोर्ट में पेश किया गया।

गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' नाम के एक एनजीओ ने दंगों की कहानियां बनाकर झूठे हलफनामे दाखिल किये। गुजरात सरकार ने अपनी विशेष जांच टीम की रिपोर्ट के आधार पर यह बातें रखी हैं।

गुजरात सरकार की ओर से पेश वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता मुकुल रोहतगी ने जस्टिस अरिजीत पसायत की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ से कहा कि पूर्व सीबीआई निदेशक रके राघवन की अध्यक्षता वाली विशेष जांच टीम की रिपोर्ट से स्‍पष्‍ट हो गया है कि एनजीओ द्वारा लगाए गए सभी प्रमुख आरोपों को जांच टीम ने सही नहीं पाया है। रिपोर्ट ने एनजीओ के आरोपों को झूठा करार दिया है। इनमें नरोरा पाटिया में लाशों को कुएं में फेंकना, कौसर बानो से बलात्‍कार कर उसकी हत्‍या करना, आदि मामले शामिल हैं। एनजीओ द्वारा पेश सभी 22 हलफनामे एक जैसे ही हैं।

पीसी पाण्‍डेय को क्‍लीन चिट

सरकारी वकील द्वारा अहमदाबाद पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक पीसी पांडेय पर लगे आरोपों को गलत करार दिया। पांडेय पर आरोप था कि वह गुलबर्गा सोसाइटी को जलाने में दंगइयों की मदद कर रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि पांडेय घायलों को अस्पताल पहुंचा रहे थे। इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पाण्‍डेय को क्‍लीन चिट भी दे दी है।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दंगों के मामले में देर होने से झूठ के घुस आने की संभावना ज्यादा हो जाती है, इसलिए इनकी तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतें होनी चाहिए। इन मामलों की सुनवाई या फैसलों में देरी करना नुकसानदायक हो सकता है।

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