कंधमाल: चुनाव के बाद सुधरेंगे हालात?

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कंधमाल में शिविरों में अनिश्चितता की स्थिति में रह रहे ईसाइयों को चुनाव के बाद भी हालात में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है. ज़मीन पर चुपचाप बैठे इन लोगों के चेहरों पर मोमबत्तियों की रोशनी पड़ रही है. वे प्रार्थना करते हुए धीरे धीरे कुछ बोल भी रहे कर रहे हैं.

ईसाइयों के लिए ईस्टर आशा के संचार का समय होता है लेकिन उड़ीसा के कंधमाल में आशा और उम्मीदों की बहुत कमी हो गई लगती है. पिछले एक साल से यह संप्रदाय यहाँ हुई हिंसा की वजह से बहुत आतंकित है. इसे स्वतंत्रता के बाद ईसाइयों के विरुद्ध सबसे घिनौनी हिंसा कहा जा रहा है.

इस हिंसा में अनेक लोग मारे गए और सैकड़ों चर्चों और घरों को नष्ट कर दिया गया. राएकिया में मिनाती दिगल और उत्सव भी आधी रात की इस सभा में आए हैं.पिछले साल उनके सामने ही उनके घर को जला दिया गया था. वहाँ के चर्च भी तबाह हो गए थे. उनके पास कुछ बचा था तो सिर्फ़ प्रार्थना.

असुरक्षा और आतंक

अब वे 11 दूसरे परिवारों के साथ एक मैदान में रहते हैं. यह सभी लोग लकड़ी और प्लास्टिक की चादरों से बने एक शिविर में रहते हैं. यहाँ हमारी किसी तरह की सुरक्षा नहीं है. यहाँ आतंक की ऐसी अनुभूति है कि हम पर कोई कभी भी हमला कर सकता है. इसलिए हम कोशिश करते हैं कि दिन में सोएँ और रात में पहरा दें   उत्सव दिगल

 यहाँ हमारी किसी तरह की सुरक्षा नहीं है. यहाँ आतंक की ऐसी अनुभूति है कि हम पर कोई कभी भी हमला कर सकता है. इसलिए हम कोशिश करते हैं कि दिन में सोएँ और रात में पहरा दें

उत्सव और मिनाती का कहना है कि अब कोई ईसाइयों को दिहाड़ी मज़दूर नहीं रखता और बच्चे स्कूल नहीं जा सकते.उत्सव का कहना है, "हम यहाँ रहते हुए बहुत मुश्किलों से गुज़र रहे हैं."

उन्होंने कहा, "यहाँ हमारी किसी तरह की सुरक्षा नहीं है. यहाँ आतंक की ऐसी अनुभूति है कि हम पर कोई भी, कभी भी हमला कर सकता है. इसलिए हम कोशिश करते हैं कि दिन में सोएँ और रात में पहरा दें." मिनाती शिकायत करती हैं कि उन्हें सरकार से भी पर्याप्त मदद नहीं मिल रही है. यहाँ तक कि उनके पास इतने चावल भी नहीं हैं कि सबका ढंग से पेट भर सके.

पड़ावों में ज़िंदगी

उन्होंने कहा, "यहाँ हम बहुत से लोग हैं. अब हम ऐसी किसी जगह पर जाना चाहते हैं, जहाँ हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी सकें. यहाँ हमें निशाना बनाया जा रहा है और लगातार धमकियाँ मिल रही हैं." कंधमाल के हज़ारों ईसाई अब भी अलग अलग पड़ावों में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं

कंधमाल के हज़ारों ईसाई अब भी अलग अलग ठिकानों पर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं और उनके पूर्व पड़ोसी उन्हें उनके घर में नहीं जाने दे रहे हैं. उन्हें तभी अपने घर में रहने की अनुमति दी जा रही है जब वे हिंदू धर्म ग्रहण करें और पिछले साल की हिंसा में कथित रूप से शामिल किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ अगर उन्होंने कोई आरोप लगाया है तो उसे वापस लें.

एक गाँव में हिंदुओं से कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी ईसाई से बात करता हुआ भी पाया गया तो उसे जुर्माने के तौर पर एक हज़ार रुपए देने होंगे. हम हिंदू गाँववासियों से मिलने गए तो वहाँ भारतीय जनता पार्टी की एक छोटी सी चुनावी रैली चल रही थी.16 अप्रैल को उड़ीसा में लोकसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान होना है.

मर्यादा

इसके बाद हम क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में भाजपा उम्मीदवार अशोक साहू के पास गए जहाँ एक और उजड़े हुए चर्च के अवशेष हैं. अशोक साहू कहते हैं कि अगर उन्हें ग़िरफ़्तार किया गया तो ज्वालामुखी फूट पड़ेगा.साहू ज़ोर डालते हुए कहते हैं, "जिनके साथ भेदभाव हो रहा है, वे हिंदू हैं. पिछले साल की हिंसा के बाद से सैकड़ों लोगों को ग़िरफ़्तार किया गया है."

उन्होंने कहा, "मैं हिंसा को उचित नहीं ठहरा रहा लेकिन यहाँ दो तरह की हिंसा हुई है. एक तो योजनाबद्ध हिंसा और दूसरी उसकी प्रतिक्रिया में हुई हिंसा." अशोक साहू के अनुसार, "यह सच है कि मरने वालों में ज़्यादा संख्या ईसाइयों की है लेकिन क्यों? हिंदुओं का मर्यादा बोध अचानक ही फूट पड़ा. वे अपनी मर्यादा की रक्षा करना चाहते हैं."

अब अशोक साहू पर अपने चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए एक भाषण में ईसाइयों के ख़िलाफ़ घृणा बढ़ाने के आरोप हैं. वे कहते हैं कि यह उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक साज़िश है.उनका कहना है, "अगर मुझे ग़िरफ़्तार किया गया तो एक ज्वालामुखी फूट पड़ेगा."

बंटवारा

उदयगिरि शहर के बाज़ार के इलाक़े में रह रहे क़रीब 43 ईसाई परिवारों के लिए यह आसान नहीं है. बाज़ार के दिनों में उन्हें उनके सामान के साथ कोने में धकेल दिया जाता है. जाति और धर्म के नाम पर लोग बँट गए हैं और आनेवाले चुनाव हालात को और भी ख़राब करने वाले हैं   फ़ादर अजय सिंह

 जाति और धर्म के नाम पर लोग बँट गए हैं और आनेवाले चुनाव हालात को और भी ख़राब करने वाले हैं

ज़िले में हिंसक वारदातों को आठ महीने से भी ज़्यादा गुज़रने के बावजूद बहुत कम उम्मीद है कि राजनीतिक बदलाव से यहाँ कुछ बेहतर हो सकेगा.

बाज़ार में रह रहे प्रफुल्ल मलिक कहते हैं, "यहाँ कुछ शांति समितियाँ बनी हैं लेकिन उनमें वही लोग हैं जिन्होंने हिंसा का नेतृत्व किया. तो अब वह क्या भला करेंगे."

एक स्थानीय पादरी, फ़ादर अजय सिंह कहते हैं, "जनता और अधिकारी सभी यहाँ रह रहे लोगों की अनदेखी कर रहे हैं. किसी को इनकी कोई चिंता नहीं है." उन्होंने कहा, "जाति और धर्म के नाम पर लोग बँट गए हैं और आने वाले चुनाव हालात को और भी ख़राब करने वाले हैं."

कंधमाल के ईसाइयों की पुकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है. लेकिन इसके बावजूद यह लोग भारी अनिश्चितता की स्थिति में जी रहे हैं. यहाँ हिंसा की जड़ें काफ़ी गहरी हैं. पिछले साल एक हिंदू नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद भारी हिंसा भड़क उठी थी.

ज़्यादातर ईसाई तो क्षेत्र से निकल भागे और संकेत मिले हैं कि कुछ हिंदूवादियों ने बाक़ी लोगों को क्षेत्र छोड़ने पर मजबूर किया. अब इस चुनावी मौसम में कंधमाल धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की परीक्षा बना हुआ है.

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