लिट्टे समर्थक प्रतिनिधिमंडल भारतीय नेताओं से मुलाकात करेगा

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नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। तमिल विद्रोहियों से संबद्ध श्रीलंकाई सांसदों का एक शिष्टमंडल इस सप्ताह भारतीय नेताओं से मुलाकात कर विद्रोहियों के कब्जे वाले सीमित इलाके में फंसे नागरिकों की तकलीफों के बारे में विचार-विमर्श करेगा।

तमिल नेशनल एलायंस(टीएनए) का दल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के.नारायणन और विदेश सचिव शिवशंकर मेनन से मुलाकात करने के लिए बुधवार को राजधानी पहुंचेगा।

टीएनए को लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) का राजनीतिक मोर्चा माना जाता है। शिष्टमंडल के सदस्य मुल्लईतिवू जिले के कुछ हिस्से में फंसे हजारों नागरिकों के हालात के बारे में चर्चा करेंगे। इस सीमित क्षेत्र में लिट्टे विद्रोही अपने वर्चस्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं।

टीएनए शिष्टमंडल के नेता आर. संबानाथन ने चेन्नई से आईएएनएस को फोन पर बताया, "हम लोगों की हिफाजत को लेकर चिंतित हैं। हम तमिलों के लिए खतरनाक बन चुके वहां के हालात के बारे में विचार-विमर्श करेंगे। हम भारत से कार्रवाई का अनुरोध करेंगे।"

संबानाथन ने ज्यादा ब्यौरा नहीं देते हुए कहा कि वह नई दिल्ली में बातचीत के बाद मीडिया को जानकारी देंगे।

टीएनए के दल का यह दौरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से उन्हें दिए गए निमंत्रण के बाद हो रहा है। पिछले साल अगस्त में श्रीलंका यात्रा के दौरान मनमोहन सिंह ने कोलंबो में भेंट के लिए आए तमिल और मुस्लिम पार्टियों के नेताओं को यह निमंत्रण दिया था। प्रधानमंत्री वहां दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) की बैठक में हिस्सा लेने गए थे।

गत जनवरी में श्रीलंका की यात्रा पर गए विदेश सचिव ने यह निमंत्रण दोहराया था। भारत यात्रा को लेकर टीएनए में पिछले कुछ अर्से से दुविधा थी क्योंकि लिट्टे उससे नाखुश था। लिट्टे का मानना है कि भारत तमिल विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए गुपचुप तरीके से श्रीलंका सरकार को मदद करता आया है।

श्रीलंका में सेना का शिंकजा कसने के बाद लिट्टे का नियंत्रण अब मुल्लइतिवू के बहुत छोटे से इलाके पर रह गया है, जहां बड़ी तादाद में नागरिक फंसे हुए हैं। श्रीलंका सरकार का आरोप है कि लिट्टे विद्रोही नागरिकों को जबरन वहां रोके हुए हैं और उनका इस्तेमाल ढाल के रूप में कर रहे हैं जबकि लिट्टे का कहना है कि लोग अपनी मर्जी से वहां रुके हुए हैं।

इस संघर्ष में सैकड़ों नागरिकों के मारे जाने या गंभीर रूप से घायल होने का समाचार है। लिट्टे क्षेत्र से पलायन करने वालों को विशेष शिविरों में रखा गया है। भारत ने श्रीलंका सरकार से अतिरिक्त सावधानी बरतने का अनुरोध किया है ताकि प्रभावित आबादी को राहत मिल सके।

श्रीलंका सरकार ने तमिल और सिंहली नववर्ष के दौरान अस्थायी युद्धविराम घोषित कर रखा है लेकिन उसने लंबे अर्से तक युद्धविराम रखने से यह कहकर मना कर दिया है कि इससे लिट्टे को फिर से ताकत इकट्ठी करने में मदद मिलेगी।

भारत ने पूर्वी त्रिंकोमाली जिले में चिकित्सा दल और दवाइयां भेजी हैं। भारत की शिकायत यह रही है कि टीएनए जहां लिट्टे के पक्ष में आवाज उठाती है लेकिन उसके सांसदों का लिट्टे विद्रोहियों पर कुछ खास असर नहीं है।

वर्ष 2002 में नार्वे द्वारा प्रायोजित युद्धविराम के बाद अपने नियंत्रण में आए लगभग सारे इलाकों में शिकस्त खा बैठे लिट्टे विद्रोही सेना को खुद पर काबू पाने से रोकने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। जबकि श्रीलंका सरकार ये देख रही है कि वह किस हद तक अंतर्राष्ट्रीय विरोध झेल सकती है और करीब 20 वर्ग किलोमीटर के दायरे में सिमटे लिट्टे पर निर्णायक वार करने के लिए कितने नागरिकों का हताहत होना बर्दाश्त कर सकता है।

इसी संदर्भ में टीएनए प्रतिनिधिमंडल भारत के दौरे पर है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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