नार्वे को हटाना पश्चिम के साथ श्रीलंका की असुविधा का संकेत

नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। शांति वार्ता के मध्यस्थ की भूमिका से नार्वे को हटाने की कार्रवाई से यह स्पष्ट हो गया है कि तमिल विद्रोहियों को सैन्य ताकत से दबाने की तैयारी में लगा श्रीलंका पश्चिमी देशों को लेकर असुविधा महसूस कर रहा है।

रविवार को नार्वे की राजधानी ओस्लो में श्रीलंकाई दूतावास पर तमिलों की एक भीड़ के हमले के बाद कोलंबो ने सोमवार को घोषित कर दिया कि उसकी अब लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के साथ शांति वार्ता में नार्वे को मध्यस्थ बनाने की इच्छा नहीं है।

राजनयिक सूत्रों के अनुसार इसका असली कारण यह है कि श्रीलंका को संदेह है कि अलग-थलग पड़े लिट्टे को नार्वे अमेरिका और ब्रिटेन तक पहुंचाने में सहायता कर सकता है।

श्रीलंका में शांति प्रक्रिया कुछ समय पहले ही समाप्त होने के बावजूद नार्वे आधिकारिक तौर पर पहले हुए एक शांति समझौते के मध्यस्थ का तमगा लटकाए हुए था। उल्लेखनीय है कि छह दौर की वार्ता के बाद वर्ष 2002 में श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच समझौता हुआ था। परंतु मध्य 2006 में युद्ध छिड़ने के साथ ही श्रीलंका ने नार्वे पर लिट्टे का पक्षपाती होने का आरोप लगाया था।

श्रीलंका सरकार के इस निर्णय के बावजूद नार्वे ने लिट्टे से संपर्क कायम रखने का निर्णय लिया है। उसने करीब एक दशक बाद महसूस किया कि श्रीलंका में सभी को खुश करना संभव नहीं है। भारत ने यह पाठ काफी पहले पढ़ लिया था और नार्वे को भी इससे अवगत करा दिया था, जब वह श्रीलंका के दलदल में कूदने जा रहा था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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