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पाकिस्तानी संसद ने स्वात शांति समझौते को मंजूरी दी (लीड-3)

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जरदारी द्वारा निजाम-ए-आदिल कानून पर हस्ताक्षर किए जाने के साथ ही उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) के स्वात घाटी सहित मालकंद डिवीजन में शरिया कानून लागू हो जाएगा। इसके बदले तालिबान आतंकियों को अपने हथियार डालने हैं।

जरदारी ने एनडब्ल्यूएफपी सरकार और तालिबान से संबद्ध मौलाना सूफी मोहम्मद के बीच 16 फरवरी को हुए समझौते को अपनी मंजूरी दे दी थी। लेकिन बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय दबावों के कारण वे इसकी अकेले जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे।

जीयो टीवी ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के हवाले से कहा है, "हम प्रांतीय सरकार के आदेश का सम्मान करते हैं और जनता को बधाई देते हैं।"

हालांकि इस समझौते को मंजूरी दिए जाने के बाद मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के सदस्यों ने सदन का बहिष्कार किया।

इसके पहले गिलानी ने सोमवार को कहा था कि तालिबान के साथ किए गए विवादास्पद शांति समझौते को संसद में इसलिए पेश किया गया, क्योंकि सरकार इस मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति चाहती थी।

समाचार एजेंसी एपीपी ने गिलानी के हवाले से कहा था, "चूंकि संसद प्रधान है, लिहाजा हम उसे दरकिनार नहीं करना चाहते थे।"

गिलानी ने कहा था, "हम चाहते हैं कि हमारे हाथ मजबूत होने चाहिए। और पूरा देश हमारे साथ है।"

गिलानी ने कहा था, "राष्ट्रपति ने समझौते पर अपनी सहमति दे दी है। उन्होंने इसे हरी झंडी दे दी है और स्थानीय प्रशासन भी इससे सहमत है। अब हमारी सहमति के साथ ही यह समझौता पक्का हो जाएगा।"

सच्चाई हालांकि यह है कि जब जरदारी ने समझौते पर अपनी सहमति दी थी, उस समय इस पर संसद की सहमति नहीं ली गई थी।

इसके पहले संसदीय मामलों के मंत्री बाबर अवान ने एनडब्ल्यूएफपी सरकार और तालिबान से संबद्ध मौलाना सूफी मुहम्मद के बीच स्वात सहित छह अन्य जिलों में सरिया कानून लागू करने को लेकर 16 फरवरी को किए गए समझौते को सदन पटल पर रखा।

समझौते को सदन पटल पर रखे जाने से खफा गठबंधन सरकार में हिस्सेदार अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) के सदस्यों ने सदन का बहिष्कार किया। ज्ञात हो कि एएनपी, एनडब्ल्यूएफपी में गठबंधन सरकार का नेतृत्व करती है। एएनपी ने आरोप लगाया कि इस बारे में उससे चर्चा नहीं की गई।

एनडब्ल्यूएफपी के सूचना मंत्री इफ्तिखार हुसैन ने कहा है, "यदि समझौते को सदन में पेश किया जाना जरूरी था तो इसके लिए पहले एएनपी को विश्वास में लिया जाना चाहिए था।"

हुसैन के अनुसार राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी इसे मंजूरी देने के लिए अधिकृत थे।

समाचार पत्र 'द न्यूज' में सोमवार को प्रकाशित रिपोर्ट पर भरोसा करें तो जरदारी भविष्य में शांति समझौते के किसी भी विपरीत प्रभाव की जिम्मेदारी लेने से बचना चाहते थे, लिहाजा उन्होंने इसे संसद में पेश करने का निर्णय लिया। अब किसी भी परिणाम के लिए संसद जिम्मेदार होगी।

जरदारी ने जब उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत की सरकार को तालिबान से संबंधित मौलाना सूफी मुहम्मद के साथ समझौता करने के लिए आगे बढ़ने को कहा था, तब संसद को भरोसे में नहीं लिया गया था। समझौते के तहत यह शर्त रखी गई थी कि स्वात और अन्य छह जिलों में शरिया कानून लागू होने के बदले आतंकवादी हथियार डाल देंगे।

अब जरदारी ने कहा कि वह क्षेत्र में शांति स्थापित हुए बिना समझौते को मंजूरी नहीं देंगे।

अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों का मानना है कि समझौता तालिबान के सामने झुकने के समान है। यह थोड़ा हासिल करने के बदले बहुत अधिक गंवाने के समान है।

इस कदम से जरदारी ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को भी दुविधा में डाल दिया है। गिलानी को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति समझौते पर हस्ताक्षर कर देंगे।

जानकारों के अनुसार संसदीय मामलों के मंत्री बाबर अवान ने राष्ट्रपति को समझौते की जिम्मेदारी खुद न उठाने और इसे संसद में चर्चा और अनुमति के लिए पेश करने की सलाह दी।

जरदारी ने इस उपाय से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के नेता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी मुश्किल में डाल दिया है। यदि वह शांति समझौते का विरोध करते हैं तो आतंकवादियों सहित सभी कट्टरपंथी ताकतों के गुस्से का निशाना बन सकते हैं और यदि समझौते का समर्थन करते हैं तो उन्हें अमेरिकी समर्थन से हाथ धोना पड़ सकता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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