जरदारी ने स्वात शांति समझौते को संसद के पाले में उछाला

समाचार पत्र 'द न्यूज' की रिपोर्ट में सोमवार को कहा गया कि जरदारी भविष्य में शांति समझौते के किसी भी विपरीत प्रभाव की जिम्मेदारी लेने से बचना चाहते थे, अब किसी भी परिणाम के लिए संसद जिम्मेदार होगी।

जरदारी ने जब उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत की सरकार को तालिबान से संबंधित मौलाना सूफी मुहम्मद के साथ समझौता करने के लिए आगे बढ़ने को कहा था, तब संसद को भरोसे में नहीं लिया गया था। समझौते के तहत यह शर्त रखी गई थी कि स्वात और अन्य छह जिलों में शरिया कानून लागू होने के बदले आतंकवादी हथियार डाल देंगे।

अब जरदारी ने कहा कि वह क्षेत्र में शांति स्थापित हुए बिना समझौते को मंजूरी नहीं देंगे।

अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों का मानना है कि समझौता तालिबान के सामने झुकने के समान है। यह थोड़ा हासिल करने के लिए बहुत अधिक गंवाने के समान है।

इस कदम से जरदारी ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को भी दुविधा में डाल दिया है, जिन्हें उम्मीद थी कि राष्ट्रपति समझौते पर हस्ताक्षर कर देंगे।

जानकारों के अनुसार संसदीय मामलों के मंत्री बाबर अवान ने राष्ट्रपति को समझौते की जिम्मेदारी खुद न उठाने और इसे संसद में चर्चा और अनुमति के लिए पेश करने की सलाह दी।

जरदारी ने इस उपाय से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के नेता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी मुश्किल में डाल दिया है। यदि वह शांति समझौते का विरोध करते हैं तो आतंकवादियों सहित सभी कट्टरपंथी ताकतों के गुस्से का निशाना बन सकते हैं और यदि समर्थन किया तो उनको अमेरिकी समर्थन से हाथ धोना पड़ सकता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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