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साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का निधन

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साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का निधन

विष्णु प्रभाकर 97 वर्ष के थे. उनके परिवार में उनकी दो बेटियाँ और दो बेटे है.

विष्णु प्रभाकर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान करने का फ़ैसला किया था.

उन्हें उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. उनका लेखन देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान के लिए जाना जाता था.

उनकी प्रमुख कृतियों में 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'संघर्ष के बाद' और 'आवारा मसीहा' शामिल हैं.

इनमें से 'आवारा मसीहा' प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी की जीवनी है जिसे अब तक की तीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी जीवनी में एक माना जाता है.

विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के मीरापुर गाँव में हुआ था. उनकी माता महादेवी एक शिक्षित महिला थीं जिन्होंने अपने समय में परदा प्रथा का विरोध किया था.

हिंदी में प्रभाकर

उनकी पहली नौकरी एक चतुर्थ श्रेणी की थी और उन्हें मात्र 18 रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था.

उन्होंने अपनी इस नौकरी के साथ पढ़ाई भी जारी रखी और हिंदी में प्रभाकर और हिंदी भूषण की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी में भी स्नातक किया.

बाद में अपनी नौकरी के साथ ही उन्होंने एक नाटक कंपनी में भी भाग लिया और 1939 में 'हत्या के बाद' नामक एक नाटक लिखा जो उनका पहला नाटक था.

बीच में कुछ समय के लिए उन्होंने लेखन को अपना पूरा समय दिया. उन्होंने 1938 में सुशीला नामक युवती के साथ विवाह किया.

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1955 से 1957 तक आकाशवाणी, नई दिल्ली में ड्रामा निर्देशक के रूप में काम किया.

वर्ष 2005 में उन्होंने राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार होने का आरोप लगाते हुए अपना पद्मविभूषण सम्मान लौटाने की बात कही थी.

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