आज़मगढ़ में आतंकवाद है सबसे अहम मुद्दा

कई राजनीतिक, जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों पर वोट दे रहे इस देश में लेकिन आज़मगढ़ लोकसभा सीट पर आतंकवाद ही चुनाव का सबसे प्रमुख मुद्दा है.
चुनावी दंगल में जहाँ जातियाँ, नीतियाँ और प्रत्याशियों की छवि निर्णायक जनाधार जुटाती हैं, वहीं आज़मगढ़ में आतंकवाद के नाम पर परेशान किया जाना, आतंकवाद से आज़मगढ़ का नाम जोड़ा जाना और आतंकवाद को ख़त्म किया जाना प्रमुख मुद्दे हैं.
आज़मगढ़ के मुसलमानों को बिना सबूतों के आतंकवाद से जोड़ देना एक राजनीतिक साजिश के तहत हो रहा है. मैंने इसके लिए लगातार आवाज़ उठाई है और आगे भी उठाऊंगा अकबर अहमद डंपी, बसपा उम्मीदवार
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पिछले साल जयपुर, दिल्ली में हुए बम विस्फोटों और दिल्ली के बटला हाउस इलाके में पुलिस एनकाउंटर की घटना के बाद से आज़मगढ़ का नाम एकाएक देशभर में चर्चा में आ गया.
आज़मगढ़ के गाँवों से पिछले दो बरसों में दर्जन भर युवाओं को हिरासत में लिया जा चुका है. इनपर आरोप लगा है कि ये चरमपंथी कार्रवाइयों में शामिल थे.
32 लाख से ऊपर की आबादी वाले आज़मगढ़ ज़िले में एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है.
मुस्लिम समुदाय का दर्द
मुस्लिम परिवारों के ही युवाओं पर चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप इस बिरादरी के लिए तकलीफ़देह रहा.
आज़मगढ़ ज़िले में एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है
आज़मगढ़ से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी अकबर अहमद डंपी कहते हैं, '' आज़मगढ़ के मुसलमानों को बिना सबूतों के आतंकवाद से जोड़ देना एक राजनीतिक साजिश के तहत हो रहा है. मैंने इसके लिए लगातार आवाज़ उठाई है और आगे भी उठाऊंगा.''
उधर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी का कहना है कि दाऊद और अबू सलेम जैसे अंडरवर्ल्ड माफिया के नाम से पहले ही आज़मगढ़ बहुत बदनाम हो चुका है. इसबार ताज़ा गिरफ़्तारियों ने पूरी आज़मगढ़ की छवि को धूमिल किया है. इसे आज़मगढ़ के लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे.
भाजपा के प्रचार में जुटे कार्यकर्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि चंद लोगों और एक बिरादरी की वजह से पूरा आज़मगढ़ क्यों बदनाम हो इसलिए इस ज़िले से आतंकवाद या उससे जुड़े लोगों, नेताओं को उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है.
जामिया एनकाउंटर के बाद आज़मगढ़ में जो आक्रोश मुसलमानों में पैदा हुआ था, उसका नतीजा है क्षेत्रीय स्तर पर सिर उठा रही पार्टी, उलेमा काउंसिल.
उलेमा काउंसिल ने डंपी और बसपा के दावे को दरकिनार कर ज़िले के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक जावेद अख़्तर को टिकट दिया है. डॉक्टर जावेद कहते हैं कि उलेमा काउंसिल ही यहाँ के भयभीत मुसलमानों को न्याय दिलाने की दिशा में सच्चाई से काम करेगी.
वहीं समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी की ओर से भी दोहराया जा रहा है कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों के हितों का ध्यान देती रही है.
हालांकि ज़िले में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने मुख्य रूप से दलितों, पिछड़ों और ग़रीबों के हितों की ही बात रखी पर यह कहने से नहीं चूकीं कि उनकी पार्टी और सरकार संप्रदाय के आधार पर लोगों को परेशान करने के ख़िलाफ़ रही है और ऐसा होने नहीं देगी.
जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की छाप यहां के चुनाव पर भी है पर आतंकवाद सबसे ऊपर है. एक बड़ा मतदाता वर्ग अपनी राय बनाने में इसी मुद्दे को प्रमुखता दे रहा है.
चाहे ऐसा राजनीतिक दलों की ओर से प्रेरित किए जाने के कारण हो, या फिर अपनी जाति, बिरादरी की आपबीतियों के कारण.
मतदाता अपने-अपने मन को बनाते समय दुविधा में भी हैं. यही, कि उनका प्रत्याशी क्या वाकई इस मुद्दे पर कुछ प्रभावी कर पाने की स्थिति में होगा, जिसपर वे उसे चुनकर संसद तक भेजना चाह रहे हैं.


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