मणिपुर में मतदाताओं के लिए राज्य की अखंडता अहम मुद्दा
इंफाल, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। राज्य की अखंडता मणिपुर के लोगों के लिए न सिर्फ एक अहम मुद्दा है बल्कि यह एक भावनात्मक विषय भी है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल इस बार के लोकसभा चुनाव में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं।
राज्य में वर्ष 2001 में हिंसा भड़क उठी थी। उसी समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-इसाक-मुइवाह (एनएससीएन-आईएम) के साथ नागालैंड से बाहर मणिपुर में संघर्ष विराम पर सहमत हुए थे।
वाजपेयी सरकार के इस कदम के बाद राज्य के मेइतेयी समुदाय में आक्रोश फैल गया था। इसके बाद भड़की हिंसा में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई थी।
विद्रोही संगठन एनएससीएन-आईएम असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिंस्सों को मिलाकर एक अलग राज्य के गठन की मांग कर रहा है।
माणिपुर के मुख्यमंत्री ओराम इबोबी सिंह ने आईएएनएस से कहा, "कांग्रेस पार्टी का नजरिया बहुत साफ है। हम अपनी जमीन का एक इंच भी नहीं बांटने जा रहे। वाजपेयी सरकार एमसीएसन-आईएम के साथ बिना किसी क्षेत्रीय सीमा के समझौता किया।"
राज्य की सभी पार्टियों ने क्षेत्रीय अखंडता को अपने घोषणा पत्रों में प्रमुखता से जगह दी है। इसके अलावा सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफ्सपा) को हटाने का मुद्दा भी इस बार के चुनाव में अहम है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता पुर्णो संगमा ने कहा, "हम राज्य के लोगों की भावनाओं के मुताबिक इस अधिनियम को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।"
इबोबी सिंह ने कहा, "हम भी इस कानून को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं लेकिन इससे पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हत्या और अपहरण रूक जाए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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