झारंखड में चुनावी मुद्दा बना कोयला खानों में लगी आग

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झारखंड की सरकार ने पिछले वर्ष 6,400 करोड़ रुपये के एक प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की थी। भूमिगत आग के कारण हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और हजारों एकड़ की उपजाऊ भूमि तबाह हो गई है। इसने झरिया शहर के दर्जनों घर को निगल लिया और कम से कम 30 लोग मौत के शिकार हुए हैं।

'झरिया कोल फिल्ड बचाओ समिति' ने शहर के करीब 80 हजार मतदाताओं के बीच पर्चा बांटकर लोगों से केवल उसी पार्टी को वोट देने की अपील की है जो लोगों को क्षेत्र से हटाने के बजाय खानों में लगी आग पर काबू पाने का वादा करे।

समिति के एक सदस्य पिनाकी राय ने कहा, "सरकार द्वारा घोषित पुनर्वास पैकेज में लोगों से झरिया शहर खाली करने को कहा गया है, लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं है।"

समिति के अध्यक्ष मदन लाल खन्ना ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों पार्टियों ने लोगों के साथ धोखाधड़ी की। उन्होंने कहा, "हम मतदाताओं से अपील करते हैं कि मतदान करते समय वे सचेत रहें।" उन्होंने कहा कि आग का समाधान है लेकिन राजनीतिक दलों का इसमें कोई रुचि नहीं है।

'भारत कूकिंग कोल लिमिटेड' के अधिकारियों के मुताबिक राजधानी रांची से करीब 270 किलोमीटर दूर धनबाद जिले के झरिया में सन 1896 में खदान की स्थापना की गई थी। यहां कोयले का विशाल भंडार है। यहां वर्ष 1916 में पहली बार आग का पता चला। उस समय यह 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। आग के कारण अब तक 3.9 करोड़ टन कोयला नष्ट हो चुका है।

विशेषज्ञों के मुताबिक खदान में अब भी सौ करोड़ टन कोयला है। लेकिन इसका दोहन तभी किया जा सकता है जब लोगों को यहां से हटा दिया जाय और आग पर काबू पा लिया जाय।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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