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'आवारा मसीहा' के रचयिता विष्णु प्रभाकर नहीं रहे (लीड-1)

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उन्हें करीब दो सप्ताह पहले छाती में संक्रमण और श्वास लेने में तकलीफ के बाद पंजाबी बाग स्थित एक अस्पताल में दाखिल कराया गया था। प्रभाकर के परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं। उनकी पत्नी का पहले ही निधन हो चुका है।

आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में शामिल प्रभाकर का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर गांव में 29 जनवरी 1912 को एक पारंपरिक वैष्णव परिवार में हुआ था। उनकी मां महादेवी एक शिक्षित महिला थीं जिन्होंने उस समय के रूढ़िवादी समाज में परदा प्रथा का विरोध करने का साहस किया था।

अपनी आरंभिक शिक्षा के बाद प्रभाकर अपने मामा के घर हिसार (तत्कालीन पंजाब अब हरियाणा) चले आए। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद हालांकि वह उच्च शिक्षा अर्जित करना चाहते थे लेकिन परिवार की वित्तीय हालत प्रतिकूल होने के चलते उन्हें मन मसोस कर रह जाना पड़ा।

पारिवारिक जरूरतों के चलते प्रभाकर ने बेहद कम उम्र में चतुर्थ श्रेणी के शासकीय कर्मचारी के रूप में 18 रुपये मासिक वेतन पर काम करना शुरू कर दिया हालांकि इसके साथ उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी और हिंदी में प्रभाकर और हिंदी भूषण, संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

प्रभाकर ने उपन्यास, नाटक और कहानी जैसी हिंदी साहित्य की प्राय: प्रमुख विधाओं में लेखन किया। उनके द्वारा लिखित प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार शरतचंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' को हिंदी में लिखी गई कुछ सर्वश्रेष्ठ जीवनियों में शुमार किया जाता है।

प्रभाकर की लगभग 50 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हुआ था जिनमें 'अर्धनारीश्वर', 'आवारा मसीहा', 'ढलती रात', 'संघर्ष के बाद' और 'स्वप्नमयी' आदि प्रमुख हैं। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, राष्ट्रीयता और सामाजिक उत्थान का स्वर प्रमुख है।

उल्लेखनीय है कि प्रभाकर की अंतिम इच्छा के अनुरूप ही उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। उन्होंने मृत्युृ के बाद अपना पार्थिव शरीर 'अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान' (एम्स) को दान करने का फैसला किया था।

विष्णु प्रभाकर भौतिक रूप से भले ही हमारे बीच से विदा हो गए हों लेकिन अपने लेखन और अपने विचारों के माध्यम से वे लंबे समय तक साहित्यप्रेमियों बीच मौजूद रहेंगे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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