नीतीश को मज़दूरी का मेहनताना चाहिए

नीतीश को मज़दूरी का मेहनताना चाहिए

इस बार के चुनाव में उनकी ये साथ दाँव पर लगी हुई है. बिहार में विकास का नारा देने वाले नीतीश कुमार का मुक़ाबला लालू यादव और रामविलास पासवान के संयुक्त मोर्चे से है.

लेकिन नीतीश इससे विचलित नहीं हैं. उल्टे वे केंद्र में बिहार के मंत्रियों पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि वे चाहते तो प्रदेश के लिए बहुत कुछ कर सकते थे.

नीतीश का दावा है कि बिहार की जनता इस बार चौंकाने वाले नतीजे देगी. मैंने नीतीश कुमार से चुनाव और चुनाव से संबंधित अन्य मुद्दों पर बातचीत की.

लोकतंत्र के महापर्व के रूप में चुनाव का समय है लेकिन ऐसा भी हो जाता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट भी सबसे ज़्यादा चुनाव के समय ही पड़ती है.

लोकतंत्र की तो बुनियाद ही हैं चुनाव. लेकिन आप जानते हैं कि चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित करने, रिझाने के लिए लोग तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाते हैं.

भ्रष्ट तरीक़ों का भी उपयोग किया जाने लगा है. कुछ बातें तो चुनाव आयोग की सीमा के बाहर हैं.

जैसे किस प्रकार के लोग चुनाव लड़ें और धन का उपयोग. इन चीज़ों पर अंकुश लगे. मुझको तो लगता है कि बड़ा ही पारदर्शी युग आ गया है. तकनीक के ज़रिए कि अब किसी चीज़ को छिपा कर रखना मुश्किल है.

धनबल-बाहुबल संबंधी प्रस्ताव आयोग की तरफ़ से पिछले कुछ सालों में आया भी था लेकिन उस पर कुछ हुआ नहीं.

चुनाव के समय तो इस पर बहस हो जाती है और बाद में कोई ध्यान नहीं देता. हम लोगों को भी चुनाव के वक़्त ही उम्मीदवार का चयन करना पड़ता है.

उस समय एक ही दृष्टिकोण होता है कि कौन चुनाव जीतेगा. इस चक्कर में दूसरे दल के लोग आ जाते हैं.

जिस प्रकार पिछले तीन वर्षों में आपराधिक मामलों में कार्रवाई हुई है और जिस तरह न्यायालयों में त्वरित सुनवाई के ज़रिए सज़ा दी गई है, उससे मुझे लगता है कि हथियार लेकर घूमने की कोई हिम्मत नहीं करेगा

जिस प्रकार पिछले तीन वर्षों में आपराधिक मामलों में कार्रवाई हुई है और जिस तरह न्यायालयों में त्वरित सुनवाई के ज़रिए सज़ा दी गई है, उससे मुझे लगता है कि हथियार लेकर घूमने की कोई हिम्मत नहीं करेगा

स्वस्थ व्यवस्था तो यह होगी कि राजनैतिक दल अपने उम्मीदवार एक चुनाव ख़त्म होने के बाद ही घोषित कर दें कि अगले चुनाव के लिए हमारे यह उम्मीदवार होंगे.

अगर बीच में पार्टी किसी कारण से उम्मीदवार बदलना चाहे तो वह बदल सके. कम से कम पाँच साल वह उम्मीदवार लोगों की नज़र में रहेगा, लोगों की सेवा करेगा तो फिर अंत में जब चुनाव का समय आएगा तो इतनी आपाधापी नहीं मचेगी.

लेकिन जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी संदेह होने लग जाए तो लोकतंत्र को तो आघात लगता ही है.

अब ऐसी कुछ बातें तो चलती ही रहती हैं. आख़िरकार चुनाव आयोग ही मुख्य संस्था है और उसी को चुनाव कराना है. उन पर सारा दारोमदार है.

धीरे-धीरे चुनाव आयोग को काफ़ी अख़्तियार दिया गया है. हम समझते हैं कि चुनाव आयोग को निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए. थोड़े-बहुत आरोप तो लगते ही रहते हैं. आम लोगों को तो यही लगता है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराएगा.

हम इतना बता दें कि बिहार में राज्य सरकार की मंशा है कि यहाँ निष्पक्ष चुनाव कराया जाए. कहीं इसकी चर्चा नहीं है कि कौन कितना हथियार जुटा रहा है.

जिस प्रकार से पिछले तीन वर्षों में आपराधिक मामलों में कार्रवाई हुई है और जिस तरह न्यायालयों में त्वरित सुनवाई के ज़रिए सज़ा दी गई है, उससे मुझे लगता है कि हथियार लेकर घूमने की कोई हिम्मत नहीं करेगा.

आप रिक्शावाले और ठेलेवाले से पूछिए, अब उससे कोई रंगदारी नहीं माँगता है, उसे कोई तंग नहीं करता है. तो यह जो अहसास है, उस अहसास को टूटने देना नहीं चाहते.

नीतीश कुमार ने हर मुद्दे पर खुल कर बात की

आपको क्या लगता है कि यह अहसास आपके हक़ में वोट में तब्दील होगा?

हाँ, मुझको ऐसा लगता है क्योंकि लोगों के सहयोग से हमारी सरकार ने जो पहल की और जो पिछले सवा तीन साल के कार्यकाल में हमने कोशिश की है कि किसी भी तबके की उपेक्षा न हो और सबकी भलाई के लिए काम किया जाए. वह दिखाई पड़ रहा है लोगों को.

अस्पताल का इंतज़ाम दिखाई पड़ रहा है. स्कूलों में पढ़ाई शुरू हो गई, वो भी दिखाई पड़ रहा है. सड़कों का काम चल रहा है, कुछ पुलों का काम हो रहा है. यह दिखाई पड़ने वाली चीज़ें हैं.

हम लोगों के लिए काम कर रहे हैं तो इतना तो चाहेंगे ही कि लोग हमें प्रोत्साहित करें. आपके घर में कोई मज़दूरी करता है तो उसको मेहनताना चाहिए कि नहीं चाहिए.

आपके जनता दल यूनाइटेड के बारे में चर्चा होती है तो इससे जुड़े हुए कुछ बड़े नाम कहते हैं कि इस दल में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो गया है और नीतीश जी इस दल के नेता नहीं बल्कि अधिनायक की तरह व्यवहार कर रहे हैं. इस आरोप को आप किस तरह लेते हैं?

यह तो बहत अन्यायपूर्ण आरोप है. हम दल के लिए काम कर रहे हैं, हमने कोई पद धारण नहीं किया है संगठन में और दल में जो बड़े नाम हैं, हम सबकी इज़्ज़त करते हैं. लोगों को अपने अंतर्मन को झाँककर देखना चाहिए.

आप शायद इशारा करना चाहते होंगे जॉर्ज साहब की ओर. जॉर्ज साहब की कोई उपेक्षा नहीं हुई है.

पिछले तीन साल से उनकी स्थिति को देखकर हमें लगता है कि वो चुनाव का बोझ उठाने में सक्षम नहीं हैं. ज़िद एक अलग चीज़ है. उनको देखिए तो दिख जाता है. यह मेडिकल की समस्या है तो इसमें चिकित्सकों और उनके प्रियजनों की सलाह ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

हम लोगों के लिए काम कर रहे हैं तो इतना तो चाहेंगे ही कि लोग हमें प्रोत्साहित करें. आपके घर में कोई मजदूरी करता है तो उसको मेहनताना चाहिए कि नहीं चाहिए.

हम लोगों के लिए काम कर रहे हैं तो इतना तो चाहेंगे ही कि लोग हमें प्रोत्साहित करें. आपके घर में कोई मजदूरी करता है तो उसको मेहनताना चाहिए कि नहीं चाहिए.

पार्टी की तरफ़ से बाक़ायदा लिखित तौर पर उनसे कहा गया कि पार्टी आपके ऊपर चुनाव का बोझ नहीं डालना चाहती.

जो पहली रिक्ति राज्यसभा की होगी, उसके माध्यम से आप संसद में जाएँ और लोकसभा का चुनाव न लड़ें. अब इसे कोई अन्यथा ले ले तो क्या कहा जाए. उनको इस बात का अहसास कराने में हम लोग कामयाब नहीं हुए, यह दुखद है.

जॉर्ज साहब पार्टी के प्रत्याशी नहीं बने. लेकिन जिनको आप उनकी जगह लाए, जो कई दलों को छोड़कर आए, वो ख़ुद 88 साल के हैं. अस्सी साल के जॉर्ज की जगह पर उन्हें आपने उम्मीदवार बनाया है. ऐसा लगता नहीं है कि आपने योग्यता या उनके गुणों को देखकर उम्मीदवारी दी है.

मैं उनकी उम्र के बारे में तो नहीं जानता हूँ कि कितनी उम्र है. जॉर्ज साहब को उम्र के आधार पर नहीं बल्कि उनके स्वास्थ्य के दृष्टिगत चुनाव लड़ने से मना किया गया.

यह हालत तो किसी भी आयु में हो सकती है. जिनको उम्मीदवारी दी गई है निषाद साहब को वो वहाँ से सांसद रहे हैं. उनके बारे में आलोचना-समालोचना हो सकती है.

ख़ासकर दल-बदल के संदर्भ में....

वे पहले यहीं थे. फिर दूसरी तरफ़ गए फिर इस धारा में आए तो यह सब चलता रहा है, इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन फिर भी सभी लोगों का यही आकलन था कि वो वहाँ से अच्छे उम्मीदवार साबित हो सकते हैं.

बहुत कुछ बोल रहे हैं आपके मित्र रामविलास और लालू जी.

दोनों घबराए हुए हैं. समझते हैं कि जातीय समीकरण बैठाकर वो चुनाव जीत लेंगे. जैसा कि हमने कहा कि यह लाख समीकरण बैठा लें, दिल्ली का चुनाव है और इनके कामकाज की समीक्षा जनता करेगी.

इनमें एक दावा करते हैं कि रेलवे में बहुत निवेश किया लेकिन जो पुराना काम है वो भी पूरा नहीं कर पाए.

पटना के दीघा से सोमपुर के बीच जो पुल बनना था वो 2008 में बनकर तैयार हो जाना चाहिए था. वो यथावत रहा जो हमारे कार्यकाल में शुरू हुआ.

मुंगेर नदी में गंगा का पुल बनना चाहिए था, नहीं बना. कोसी महासेतु का काम भी ठीक ढंग से पूर्ण नहीं करा पाए. पटना-गया लाइन का दोहरीकरण नहीं करा पाए. ये किस प्रोजेक्ट की बात करते हैं?

पचपन हज़ार करोड़ रुपए के निवेश की बात करते हैं.

जॉर्ज साहब की कोई उपेक्षा नहीं हुई है. पिछले तीन साल से उनकी स्थिति को देखकर हमें लगता है कि वो चुनाव का बोझ उठाने में सक्षम नहीं हैं.

जॉर्ज साहब की कोई उपेक्षा नहीं हुई है. पिछले तीन साल से उनकी स्थिति को देखकर हमें लगता है कि वो चुनाव का बोझ उठाने में सक्षम नहीं हैं.

यह सब पहले से ही मंज़ूर है. यह अपने खाते में ज़्यादा से ज़्यादा तीन चार जो फ़ैक्ट्रियाँ गिनाते हैं वो डाल सकते हैं लेकिन उस पर क्या काम हो रहा है.

मधेपुरा में बिजली इंजन का कारखाना बनेगा. पहले से जो मधेपुरा की लाइन का गेज कंवर्ज़न. अरे पहले तो छोटी लाइन, बड़ी लाइन बनेगी, बड़ी लाइन का विद्युतीकरण होगा. तब न इंजन बनेगा बिजली का जो वहाँ से चल कर कहीं जा पाएगा.

यह सब आँखों में धूल झोंकने के समान है. सब लोग गोयवेल्स के सिद्धांत को मानने वाले हैं. एक झूठ को सौ बार दोहराओ तो वो सच का रूप धारण कर लेता है.

अब पासवान जी का हाल बताएं. बरौनी का खाद कारखाना इन्होंने चलवाया था. हम भी गए. उन्होंने कहा कि इसका पौने तीन करोड़ का बिजली का बिल माफ़ करवा दें.

हमने कहा, राज्य सरकार माफ़ कर देगी, आप काम शुरू कीजिए. लेकिन कुछ नहीं शुरू हुआ. पता चला कि सौ करोड़ का कोर्पस और चार खाद कारखाने शुरू करेंगे जिसके लिए हज़ारों करोड़ रुपए की ज़रूरत है. तो यह आँख में धूल ही झोंकना है.

समझ नहीं आता कि कभी-कभी तो आप तीनों बड़े नेता बिहार के विकास के मामले में एक ही मंच पर होते हैं. लेकिन फिर कहाँ से बिखराव आ जाता है?

हमको तो कोई परहेज़ है नहीं. बिहार का मुद्दा जब भी आया, हमने दोनों से संपर्क किया. चाहे बिहार की अस्मिता का सवाल हो, बिहारियों के साथ महाराष्ट्र में बदसलूकी हुई तो हमने पहल की.

कहा कि भई आग लग रही है, सब मिलकर संभालिए लेकिन इनके हाथ में बहुत कुछ था, दिल्ली की सरकार थी. चाहते तो बिहार के लिए बहुत कुछ करते. लेकिन वो तो दूर, जो संघीय ढाँचे की मर्यादा है, उसका भी रोज़-रोज़ उल्लंघन करते रहे.

रेल कार्यक्रमों में खड़े होकर राज्य सरकार की निंदा करना जबकि बग़ैर राज्य सरकार के सहयोग के कोई काम नहीं हो सकता. यही संविधान है और यही व्यवस्था है.

हमने वचन दिया है लोगों को कि हम कोसी इलाक़े को पहले से बेहतर बनाएंगे. और हम आपके माध्यम से फिर बताना चाहते हैं कि हम अपने संकल्प को भूलते नहीं हैं

हमने वचन दिया है लोगों को कि हम कोसी इलाक़े को पहले से बेहतर बनाएंगे. और हम आपके माध्यम से फिर बताना चाहते हैं कि हम अपने संकल्प को भूलते नहीं हैं

अब कोसी के इलाक़े की बात. वहाँ के जलप्रलय से पीड़ित लोगों में अभी भी निराशा है. सरकार से जितनी उम्मीदें थीं, वैसा हुआ नहीं. आपको क्या लगता है कि कहाँ से उस मामले में ढिलाई हुई?

नहीं, हम लोगों की तरफ़ से तो पूरी मुस्तैदी से काम किया गया है. हम तो चुनौती देंगे कि कोसी को कोई मुद्दा बनाने की कोशिश करे.

जनता में आमतौर पर संतोष हैं वहाँ के काम को लेकर. और जो कुछ भी हुआ, वह तो ऐसा विषय है कि उसके बारे में हमने भी एक जाँच आयोग बनाया है जो उचित समय पर अपनी रिपोर्ट देगा.

हम उस विवाद में जाना ही नहीं चाहते. सारे संसाधनो को एकत्र कर जो काम किया गया है वैसा आज़ाद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ है.

राहत का काम भी तीन चरणों में बाँटा गया है और हम जो चाहते हैं, उसी का पुनर्निर्माण और लोगों का पुनर्वास. इसमें केंद्र ने अब तक निर्णय नहीं किया है.

और चौदह हज़ार आठ सौ करोड़ रुपए के पैकेज की बात.....

चार महीने हम गुहार लगाते रहे कि प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय आपदा कहा तो कम से कम सूनामी की तर्ज़ पर तो मदद होनी चाहिए. पर कोई निर्णय नहीं ले सका.

तो अभी हमने जो आपदा राहत कोष की राशि के लिए निर्धारित मापदंड है, उसे बाँटना शुरू किया. हमारी योजना है कि प्रत्येक गाँव में एक सामुदायिक भवन सह शेल्टर बना दें जिसमें पाँच सौ-सात सौ लोग विपत्तिकाल में शरण ले सकें.

वह आठ फ़ीट की ऊँचाई पर बनेगा और उसके बगल में एक ऊँचा टीला जिसपर जानवर रह सकें. इस प्रोजेक्ट का एस्टीमेट 50-52 लाख का आया है.

क्या यह सच है कि आप जो 14 हज़ार आठ सौ करोड़ के विशेष पैकेज की बात कर रहे हैं, उस सिलसिले में सात महीने गुज़र गए, पर कहा जा रह है कि अभी तक डीपीआर केंद्र को नहीं भेजा गया है.

यह बिल्कुल ग़लत बात है. यह तो तैयार है अब. निजी क्षेत्र के कुछ लोग कुछ जगहों पर बना भी रहे हैं हमारे सुझाव पर. हमारे मन में ऐसी योजना है और हमने वचन दिया है लोगों को कि हम कोसी इलाके को पहले से बेहतर बनाएंगे. और हम आपके माध्यम से फिर बताना चाहते हैं कि हम अपने संकल्प को भूलते नहीं हैं.

अकलियत समाज के विकास की जब बात होती है, आपने उस सिलसिले में बहुत सी योजनाएं भी शुरू की हुई हैं तो खुलकर बताइए कि आपको क्या ऐसा लगता है कि अगर भारतीय जनता पार्टी के साथ आपका गठबंधन नहीं होता तो क्या आप और अच्छी तरह से काम कर पाते?

भाजपा के साथ हमारा गठबंधन एक ज़माने से है. बिहार में सत्ता विरोधी दल (जो लालू प्रसाद जब सत्ता में थे) के मतों के बिखराव को रोकने के लिए हम लोगों ने आपस में मिलकर चुनाव लड़ना शुरू किया. उसके अच्छे नतीजे आए. कई चुनाव हम जीते.

इनके साथ कांग्रेस होती तो हम लोगों को कुछ मुक़ाबले का सामना करना पड़ता लेकिन अब ये आपस में ही बिखर गए हैं. कांग्रेस उनके लिए कवच थी. अब लोगों का दिल फट चुका है और लालूजी के मायाजाल में लोग आनेवाले नहीं हैं.

इनके साथ कांग्रेस होती तो हम लोगों को कुछ मुक़ाबले का सामना करना पड़ता लेकिन अब ये आपस में ही बिखर गए हैं. कांग्रेस उनके लिए कवच थी. अब लोगों का दिल फट चुका है और लालूजी के मायाजाल में लोग आनेवाले नहीं हैं.

अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जो कार्यक्रम हम चला रहे हैं वो हमारी सरकार के कार्यक्रम हैं. भारतीय जनता पार्टी हमारी हिस्सेदार है तब भी हम ये कर रहे हैं.

भागलपुर के दंगापीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए जो हमने पहल की तो ऐसे मामले थे जिनमें साक्ष्य थे सबूत थे, लेकिन जहाँ चार्जशीट होना चाहिए था, वहाँ फ़ाइनल रिपोर्ट लगा दी गई थी. ऐसे 29 मामलों को अदालत की इजाज़त से फिर से खोला गया, कार्रवाई की गई और एक मामले में तो सज़ा भी हो गई.

जिस व्यक्ति को लालू जी की हुकूमत में सांप्रदायिक सदभाव का ख़िताब दिया गया, वो दंगाई था और अदालत ने उसे सज़ा दी, सबको मालूम है. हमारी नीति है उसमें हम किसी प्रकार का सांप्रदायिक तनाव बर्दाश्त नहीं करेंगे.

यही बात तो लालूजी भी कहते रहे थे इतने दिन.

कितना हुआ उनके यहाँ. हमारे यहाँ देखिए. वो क्या कहते रहे हैं, अब लोगों का दिल फट गया है. यहाँ के लोगों को मालूम है कि यह सरकार उनकी हितैषी है, राज्य में अमन चैन है. सबको इस बात का अहसास है. इसीलिए यह बौखलाहट है. अब कांग्रेस से इनका रिश्ता टूट गया है. यूपीए बिखर गया है.

अगर इनके साथ कांग्रेस होती तो हम लोगों को कुछ मुक़ाबले का सामना करना पड़ता लेकिन अब ये आपस में ही बिखर गए हैं. कांग्रेस उनके लिए कवच थी. अब लोगों का दिल फट चुका है और लालूजी के मायाजाल में लोग आनेवाले नहीं हैं.

क्या आपको लगता है कि अब इससे मुस्लिम समाज का रुझान कांग्रेस की ओर बढ़ेगा?

हमें तो ऐसा नहीं लगता लेकिन इतना तय है कि अगर वे एक होकर लड़ते तो दिल्ली के चुनाव में समय ज़्यादा बेहतर होते. इस बार चुनाव के नतीजे लोगों को चौंकाने वाले होंगे. बहुत लोग भ्रम में जी रहे हैं.

किस मायने में चौंकानेवाले होंगे नतीजे, क्या ख़ास बात होगी.

सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि सिर्फ़ जाति और संप्रदाय के आधार पर वोट नहीं पड़ेंगे. जितने भी लोग इस चक्कर में हैं, उन्हें निराशा हाथ लगेगी. जाकर गृहिणियों से पूछिए. लोग महिला वर्ग और समाज के कमज़ोर वर्ग की भावनाओं को नहीं समझ रहे हैं. हमें लगता है कि लोगों के मानस में बदलाव आया है.

बीजेपी से आप अपने रिश्ते को मुस्लिम समाज को समझा सके हैं.

उन्हें कोई कठिनाई नहीं है. उन्हें अहसास है, सरकार चल रही है, मिलकर चला रहे हैं और ठीक काम कर रहे हैं. उनके मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हुआ है.

हमारे काम को लेकर उनके मन में इसका बड़ा भारी विचार है और एक बड़ी सकारात्मक सोच है.

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