अपने किए पर अफ़सोस है: जरनैल सिंह

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में जरनैल ने बताया, "1984 के सिख विरोधी दंगे मेरे लिए भावुक मामला हैं. लोकसभा चुनावों से ठीक पहले केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दे दी. अपनी प्रेस कान्फ़्रेंस में चिदंबरम ने कहा कि मैं खुश हूँ कि मेरे साथी इस मामले से बरी हो रहे हैं."
मुझे लगा कि उनसे पूछा चाहिए कि वे देश के गृहमंत्री हैं इसलिए उन्हें केवल अपने साथियों की ही नहीं बल्कि न्याय की बात करनी चाहिए. इससे मैं बहुत भावुक हो गया और विरोध में जूता उछाल दिया. हालाँकि उन्होंने पीड़ितों के विरोध को उचित बताया लेकिन वे ऐसा पहले ही कह देते तो मैं इस तरह का काम नहीं करता जरनैल सिंह
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'गृह मंत्री हैं, न्याय की बात करें'
जरनैल का कहना था, "चिदंबरम के इस बयान पर मुझे लगा कि उनसे पूछना चाहिए कि वे देश के गृहमंत्री हैं इसलिए उन्हें केवल अपने साथियों की ही नहीं बल्कि न्याय की बात करनी चाहिए. हलांकि उन्होंने पीड़ितों के विरोध को उचित बताया था लेकिन वे ऐसा पहले ही कह देते तो मैं इस तरह का काम नहीं करता."
जरनैल ने बीबीसी को बताया कि चिदंबरम केवल कांग्रेस के घोषणापत्र में शामिल आतंकवाद के मुद्दे पर ही बात करना चाहते थे और सिखों के सवाल से बचना चाहते थे. उनका कहना था, "इससे मैं बहुत भावुक हो गया और विरोध में जूता उछाल दिया. "
जरनैल ने कहा कि वे चिदंबरम को निशाना नहीं बनाना चाहते थे. इसलिए उनकी ओर से फेंका गया उनका जूता भी दाहिनी तरफ़ गिरा.
एक पत्रकार के रूप में जरनैल को अपने किए पर बहुत अफ़सोस और खेद है. वे इस मामले को बहुत तूल नहीं देना चाहते हैं.
जरनैल बताते हैं, "मैंने चिदंबरम साहब की मुंबई के चरमपंथी हमलों के बाद किए गए काम की तारीफ़ भी की थी. उसके बाद मैंने उनसे सिख दंगों को लेकर सवाल पूछे लेकिन चिदंबरम जवाब नहीं देना चाहते थे. यह सवाल मेरे दिल के बहुत क़रीब है इसलिए मै उत्तेजित हो गया और यह घटना हो गई."
जरनैल चाहते हैं कि आतंकवाद की तरह ही सांप्रदायिक दंगों पर भी क़ानून बने
किसी तरह की राजनीति के सवाल पर उनका कहना था कि उनका किसी राजनीतिक दल से लेना-देना नहीं है और वे अकाली भी नहीं हैं. वे इस मसले पर राजनीति भी नहीं करना चाहते हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें अपना सम्मान करवाने या कोई पुरस्कार पाने की इच्छा नहीं है.
'क्या आबादी का सवाल है?'
वह सवाल उठाते हैं कि अगर दिल्ली की सड़कों पर तीन हज़ार लोग मारे गए तो उन्हें किसने मारा था, इसका जवाब तो मिलना चाहिए. वे कहते हैं, "उन्हें मारने कोई आसमान से तो नहीं उतरा था. उस समय से आज तक कई सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी ने भी दंगा पीड़ितों के बारे में नहीं सोचा. क्या केवल इसलिए कि सिखों की आबादी केवल डेढ़ फ़ीसदी है?"
वे कहते हैं कि आज केवल गुजरात, गोधरा और कंधमाल के दंगों की बात होती है लेकिन 25 साल बाद भी सिखों को न्याय नहीं मिला. उनका कहना है, "क्या यह अच्छी बात है कि किसी समुदाय के दिल में इस बात की कसक रह जाए कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है?"
जरनैल कहते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नानावती आयोग की रिपोर्ट आने के बाद जब संसद में देश से माफ़ी मांगी थी तब सभी ने उसे सराहा था. सोनिया और राहुल ने भी कहा था कि जो हुआ उसका अफ़सोस है. उनका कहना है कि इसके बाद भी कांग्रेस ने दागी लोगों को टिकट दे दिए जिससे लोगों की भावनाएँ आहत हुईं हैं.
उन्हें मारने कोई आसमान से तो नहीं उतरा था. उस समय से आज तक कई सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी ने भी दंगा पीड़ितों के बारे में नहीं सोचा. क्या केवल इसलिए कि सिखों की आबादी केवल डेढ़ फ़ीसदी है जरनैल सिंह
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वे सवाल उठाते हैं कि सीबीआई ने 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल लोगों को किस आधार पर क्लीन चिट दे दी और यदि अभियुक्त दोषी नहीं हैं तो दोषी कौन है?
जरनैल चाहते हैं कि देश में अगर आतंकवाद पर क़ानून बनाया जा सकता है तो सांप्रदायिक दंगों से निपटने के लिए भी क़ानून बनाया जाना चाहिए. इससे पूरे देश का भला होगा.


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