डेढ़ खरब डॉलर का आर्थिक सहायता पैकेज

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को संबल देने के प्रयास के तहत लाया गया ये पैकेज 150 अरब डॉलर का है.
बीमारी दूसरे देशों की है लेकिन कई दूसरे देशों की तरह जापान भी मरीज़ बन गया है. कारण ये कि जापान की अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा निर्यात पर निर्भर है. लेकिन चाहे कारें हों इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या कोई अन्य उत्पाद – जापानी सामान के खरीदारों की हालत ख़राब है.
नतीजा ये है कि जहाँ भारत में अर्थव्यवस्था सिर्फ़ पाँच से सात प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ने पर चिंता व्यक्त की जा रही है, जापान की अर्थव्यवस्था बढ़ना तो छोड़िये, वो छह प्रतिशत सिकुड़ रही है.
जापान इससे पहले दो और पैकेजों की घोषणा कर चुका है लेकिन इस तीसरे पैकेज से काफ़ी आशाएँ जुड़ी हैं.
कुल 150 अरब डॉलर का ये पैकेज जापान के राष्ट्रीय उत्पाद के 3% के बराबर है.
निसंदेह इससे जापान का कुल सरकारी ऋण और बढ़ जाएगा. लेकिन जापान को इसकी ज़्यादा चिंता नहीं है क्योंकि जापान में लोग यहाँ तक कि घरेलू महिलाएँ भी सरकारी बॉन्ड खरीदने से कतराती नहीं हैं.
जर्मनी से तुलना
यहाँ एक दिलचस्प तुलना है– जर्मनी और जापान के बीच. दोनों ही देश गहरी मंदी के दलदल के बीच फँसे हुए हैं, दोनों की ही बड़ी कमाई निर्यात से होती है लेकिन मंदी से निपटने का दोनों का तरीका एकदम अलग है.
जहाँ जापान की सरकार मंदी से निपटने के लिए तीसरे पैकेज की घोषणा कर चुकी है वहीं जर्मनी ने साफ़ कह दिया है कि वो सरकारी पैसा इस तरह बर्बाद करने के पक्ष में नहीं है.
शायद इसका कारण ये है कि आख़िरी बार जर्मनी में महंगाई तेज़ी से बढ़ी थी 1920 के दशक में हुआ था. लेकिन दूसरी ओर, जापान ने 1990 के दशक में काफ़ी आर्थिक परेशानियाँ झेली हैं जिस दौरान सरकार की आलोचना हुई थी कि उसने सही समय पर सरकारी पैसे का उपयोग कर देश की संकट से उबारने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किये.
ये संभव है कि भारत सहित दुनिया के शेयर बाज़ारों में जापान के इस स्टिम्युलस पैकेज से कुछ उछाल आ जाए, लेकिन जहाँ तक अर्थव्यवस्था का सवाल है, उसकी सेहत ठीक होने में काफ़ी समय लग सकता है.


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