भोपाल गैस त्रासदी को भूल गए राजनेता

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इस त्रासदी को 24 बरस बीत चुके हैं। दो और तीन दिसंबर 1984 की रात को याद करते ही लोग कांप उठते हैं। उस काली रात का मंजर लोग अब भी नहीं भूले हैं। त्रासदी के पहले सप्ताह में जहां आठ हजार से ज्यादा लोगों ने दम तोड़ा था, वहीं दीर्घकालिक प्रभाव सहित मौतों का कुल आंकड़ा अब 15 हजार को पार कर चुका है।

त्रासदी में कुल प्रभावितों की संख्या पांच लाख 74 हजार के करीब है। बीते 24 वषरें में इन प्रभावितों की जिन्दगी बद से बदतर होती जा रही है। लेकिन राजनीतिक दल और उनसे जुड़े नेता इसे पूरी तरह भुला चले हैं।

गैस त्रासदी के शिकार बने लोगों की बात करें तो उन्हें न तो अब तक समुचित मुआवजा मिला है और न ही वे शोध आधारित इलाज का लाभ पा सके हैं। इतना ही नहीं पीड़ितों को कार्यक्षमता घटने के अनुरूप रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराने की दिशा में पहल नहीं हुई है। यूनियन कार्बाइड कारखाने के इर्द गिर्द बसी बस्तियों के लोगों को पीने का स्वच्छ पानी तक मयस्सर नहीं है।

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के मुखिया और गैस पीड़ितों की लड़ाई के अगुआ अब्दुल जब्बार तमाम राजनीतिक दलों तथा सरकारों के रवैये से नाउम्मीद हो चुके हैं। वे कहते हैं कि 1984 की गैस त्रासदी में पांच लाख 74 हजार लोग प्रभावित हुए थे।

जब्बार कहते हैं आज भोपाल लोकसभा क्षेत्र में पौने छह लाख मतदाता गैस पीड़ित हैं। जब्बार को दुख इस बात का है कि 100-100 वोट के लिए गिड़गिड़ाने वाले नेताओं की नजरों में गैस पीड़ितों की कोई अहमियत नहीं है।

जब्बार कहते है कि वक्त गुजरने के साथ नेताओं ने गैस पीड़ितों के दर्द को भुला दिया है। यही वजह है कि पार्टियों के घोषणा पत्र से लेकर नेताओं के भाषणों तक में गैस पीड़ितों की समस्याओं को जगह नहीं है।

गैस पीड़ित परिवार के सदस्य फतेह मुहम्मद भी सरकारों के रवैये से नाराज हैं। वे कहते हैं कि उनकी मां भी गैस हादसे का शिकार बनी थी और उन्हें मुआवजा बड़ी मुश्किल से मिल पाया है। पीड़ितों को बतौर मुआवजा अधिकतम 50 हजार रुपए ही मिल पाए हैं।

कांग्रेस राज्य इकाई के प्रवक्ता मानक अग्रवाल मानते हैं कि वक्त गुजरने के साथ गैस पीड़ितों की समस्याओं पर तमाम दलों का ध्यान पहले की तुलना में कम हो चला है। अग्रवाल गैस पीड़ितों की समस्या को राजनीतिक लाभ के बगैर हल करने की पैरवी करते हैं।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता उमाशंकर गुप्ता गैस पीड़ितों को उनका हक न मिल पाने के लिए केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि गैस त्रासदी को भाजपा राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहती, इसीलिए घोषणा पत्र से लेकर नेताओं के बयानों तक में इस पर ज्यादा जोर नहीं दिया जा रहा है।

गुप्ता ने कहा कि एक ओर प्रदेश सरकार गैस पीड़ितों को सुविधाएं दिलाने के लिए प्रयासरत है वहीं केन्द्र से आवश्यक सहयोग नहीं मिल पा रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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