'साहित्य में दलितों को किस तरह परिभाषित किया जाए'

नई दिल्ली, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। राजधानी के साहित्य अकादमी सभागार में गुरुवार को एक परिसंवाद का आयोजन किया गया जिसमें सुप्रसिद्ध दलित लेखक लक्ष्मण एम गायकवाड और दलित चिंतक डाक्टर विमल थोराट ने भारतीय साहित्य में दलितों की दशा और दिशा पर अपने विचार प्रकट किए।

'भारतीय साहित्य में दलितों को कैसे परिभाषित किया जाए' विषय पर आधारित इस परिसंवाद की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष सुतिन्दर सिंह नूर ने की। उन्होंने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर साहित्य में दलितों को किस तरह परिभाषित किया जाए।

साहित्य अकादमी के सम्मान से सम्मानित गायकवाड ने परिसंवाद में अपनी बात रखते हुए कहा कि पौराणिक महाग्रंथों से लेकर वर्तमान साहित्य तक हर मौके पर दलितों और उनसे जुड़े साहित्य को हाशिए पर रखने की कोशिश हुई है। स्त्रियों को दलितों से इतर न बताते हुए उन्होंने कहा कि रामायण जैसा ग्रंथ भी एक दलित शंबूक और स्त्री सीता के विरुद्ध अन्याय की दास्तान कहता है।

गायकवाड ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दलित ही ज्यादा बेहतर दलित साहित्य की रचना कर सकता है क्योंकि उसने चीजों को दूर से नहीं देखा बल्कि भोगा है। उदाहरण के रूप में उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने भी दलितों को केंद्र में रखकर रचनाएं लिखीं लेकिन उनमें वह आग नहीं दिखती जो शरण कुमार लिंबाले या आज के अन्य दलित साहित्यकारों के भोगे हुए यथार्थ से सामने आती है।

इस अवसर पर जानीमानी दलित चिंतक डाक्टर विमल थोराट ने कहा कि दलित साहित्य का इतिहास 50 वर्ष से अधिक पुराना है लेकिन फिर भी उसे अपनी जगह की तलाश है ऐसे में उसकी स्थिति के बारे में आसानी से समझा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि हमारी सभ्यता के इतिहास के आरंभ से ही दलितों को उत्पादन और ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है और अब उनका शोषण और उत्पीड़न रचनाओं के रूप में सामने आ रहा है।

परिसंवाद के अंत में वहां उपस्थित लोगों ने भी अपने विचार और प्रश्न वक्ताओं के साथ बांटे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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