बुंदेलखंड से पलायन नहीं रहा कभी राजनीतिक दलों का एजेंडा
बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है। इस क्षेत्र में कुल आठ संसदीय क्षेत्र आते हैं। टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह और सागर जैसी लोकसभा सीटें मध्य प्रदेश में आती हैं, तो झांसी, जालौन, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के हिस्से में हैं।
इस क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती है। यहां कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। आलम यह है कि खेती भी कुछ खास वगरे के पास ही है और बहुसंख्यक वे लोग हैं, जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। जब सूखा पड़ता है तो बहुसंख्यक वर्ग दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। इन्हीं स्थितियों में इस क्षेत्र से लोग पलायन करते हैं।
स्वयंसेवी संस्था 'परमार्थ' के संजय सिंह कहते हैं कि इस इलाके में सक्रिय नेताओं ने गरीबों की भूख को कभी महत्व नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि हर गांव से लगभग 20 फीसदी परिवार पलायन कर चुके हैं। आने वाले एक पखवाड़े के भीतर यह आंकड़ा 30 फीसदी तक पहुंच जाएगा।
सिंह बताते हैं कि पलायन करने वालों के लिए वोट की कभी अहमियत नहीं रही है क्योंकि उन्हें वोट डालने का कभी अवसर ही नहीं मिल पाया। यह वर्ग जब कभी वोट डालने के लिए मतदान केन्द्रों पर पहुंचा तो पता चला कि उनका वोट तो डाला जा चुका है।
केन्द्र सरकार भले ही रोजगार गारंटी योजना के जरिए काम दिलाने का दावा करती हो, मगर इस क्षेत्र में कामगारों को 50 दिन से ज्यादा का रोजगार नहीं मिल पाया है।
खजुराहो संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार राजा पटेरिया मानते हैं कि बुंदेलखंड से पलायन बदस्तूर जारी है। इसके लिए वे सीधे तौर पर मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि मजदूरों को काम दिलाने के लिए केन्द्र सरकार ने रोजगार गारंटी योजना शुरू की है परंतु राज्य सरकार के रवैये के चलते मजदूरों को उनका हक नहीं मिल पाया है।
पटेरिया दावा करते हैं कि कांग्रेस ने बुंदेलखंड के विकास के लिए कई योजनाएं बनाई परंतु इस इलाके की अधिकांश सीटों पर गैर कांग्रेसी सांसदों का कब्जा होने के कारण योजनाओं का लाभ आम जन को नहीं मिल पाया है।
झांसी संसदीय क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार और उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री रवीन्द्र शुक्ल भी बुंदेलखंड से मजदूरों के पलायन को बड़ी समस्या बताते हैं। उन्हें लगता है कि ज्यादातर राजनेता इस क्षेत्र की पलायन की समस्या से वाकिफ नहीं रहते। यहां की विषम परिस्थितियों की जानकारी न होने के कारण अनजाने में ही इस क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार हो जाता है। केन्द्र सरकार की ओर से बजट का निर्धारण जिन आधारों पर होता है वह भी इस क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं है।
शुक्ल ने इस बार अपनी ओर से एक अलग घोषणापत्र जारी किया है जिसमें पलायन सहित बुंदेलखंड की अन्य समस्याओं के निराकरण के लिए कारगर पहल का वादा किया गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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