जी-20 नेताओं की बातचीत जारी

जी-20 नेताओं की बातचीत जारी

सम्मेलन का मुख्य ज़ोर वैश्विक आर्थिक संकट से निपटने के तरीकों पर रहेगा. बैंकिंग और अन्य संस्थानों के वित्तीय नियमन पर सहमति बनाने की भी कोशिश सम्मेलन में की जाएगी.

जर्मनी और फ़्रांस चाहते हैं कि भविष्य में इस तरह से संकट से बचने के लिए कड़ी निगरानी वाली प्रणाली अपनानी होगी. जबकि ब्रिटेन और अमरीका का कहना है कि अर्थव्यवस्था में जान फूँकने के लिए उसमें और पैसा लगाए जाने की ज़रूरत है.

इस बीच गुरुवार को लंदन में और विरोध प्रदर्शन की आशंका भी जताई जा रही है. पुलिस का कहना है कि बुधवार को प्रदर्शन करने वाले 87 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये कहना मुश्किल है कि सम्मेलन में कोई अहम सहमति हो सकेगी क्योंकि संकट से निबटने के तरीकों पर यूरोपीय और अमरीकी नेताओं में मतभेद है.

अमरीका विकास को बढ़ाने के लिए और ज़्यादा ख़र्च करने पर ज़ोर दे रहा है जबकि कुछ यूरोपीय देश वित्त बाज़ार को चलाने वाले नियमों के बदलाव पर ज़ोर दे रहे हैं.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि गंभीर आर्थिक संकट के बीच विचारधाराओं और वर्चस्व का संघर्ष भी देखने में आ रहा है.

इधर भारत और उसके जैसे विकासशील देशों के लिए चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं मंदी के नाम पर विकसित देश अपने बाज़ारों को बंद करना न शुरू कर दें और इसीलिए गुरुवार को जब सम्मेलन में भारत अपना पक्ष रखेगा तो उसका ज़्यादा ध्यान इसी ओर होगा.

मतभेद

मूल मुद्दा है आर्थिक संकट, लेकिन इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले नेता परमाणु हथियारों से लेकर पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान तक की चर्चा होगी.

आर्थिक संकट से निबटने की तरीके को लेकर फ़्रांस और जर्मनी की एक राय है.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने बुधवार को पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, " ये आर्थिक संकट शून्य से तो नहीं उपजा है. साफ़ है ये किसी की ग़लतियों, किसी की ख़ामियों का नतीजा है. अब हर ऐसा क़दम उठाने की ज़रूरत है जिससे कि ऐसा संकट फिर कभी हमारे सामने पैदा न हो सके."

फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी की राय है कि वित्तीय क्षेत्र में कड़े नियमों के अलावा और कोई उपाय नहीं बचा है.

उन्होंने कहा, " हमारा मानना है कि कडे़ नियमों के बगैर बैंकों की साख नहीं लौटेगी और उसके बिना संकट से उबरना संभव नहीं है. इसीलिए कड़े नियमों के मामले पर हम कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं."

जानकार कहते हैं कि अमरीका को ये नापसंद है क्योंकि दशकों की अमरीकी व्यवस्था में ये सोच नदारद रही है.

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