आर्थिक संकट पर जी-20 नेताओं का सम्मेलन

उम्मीद की जा रही है कि वे भविष्य में बैंकिग नियमों को और कड़े करने पर सहमत हो सकते हैं ताकि भविष्य में ऐसा संकट उत्पन्न न हो.
साथ ही वे अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए और प्रयासों पर भी वचनबद्धता दोहरा सकते हैं. लेकिन सरकारों ने अतिरिक्त धनराशि खर्च करने का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है.
दूसरी ओर गुरुवार को लंदन में और विरोध प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है. पुलिस का कहना है कि बुधवार को प्रदर्शन करने वाले 87 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.
हमारा मानना है कि कड़े नियमों पर सब एकमत हों. कडे़ नियमों के बगैर बैंकों की साख लौटेगी नहीं और उसके बिना संकट से उबरना संभव नहीं है. इसीलिए कड़े नियमों के मामले पर हम कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं फ्रांस के राष्ट्रपति निकोला सर्कोज़ी
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बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये कहना मुश्किल है कि सम्मेलन में कोई अहम सहमति हो सकेगी क्योंकि संकट से निबटने के तरीकों पर यूरोपीय और अमरीकी नेताओं में मतभेद है.
अमरीका विकास को बढ़ाने के लिए और ज़्यादा ख़र्च करने पर ज़ोर दे रहा है जबकि कुछ यूरोपीय देश वित्त बाज़ार को चलाने वाले नियमों के बदलाव पर ज़ोर दे रहे हैं.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि गंभीर आर्थिक संकट के बीच विचारधाराओं और वर्चस्व का संघर्ष भी देखने में आ रहा है.
इधर भारत और उसके जैसे विकासशील देशों के लिए चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं मंदी के नाम पर विकसित देश अपने बाज़ारों को बंद करना न शुरू कर दें और इसीलिए गुरुवार को जब सम्मेलन में भारत अपना पक्ष रखेगा तो उसका ज़्यादा ध्यान इसी ओर होगा.
उपायों पर मतभेद
मूल मुद्दा है आर्थिक संकट, लेकिन इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले नेता परमाणु हथियारों से लेकर पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान तक की चर्चा होगी.
जी 20 के विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुए हैं
आर्थिक संकट से निबटने की तरीके को लेकर फ़्रांस और जर्मनी की एक राय है.
जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने बुधवार को पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, " ये आर्थिक संकट शून्य से तो नहीं उपजा है. साफ़ है ये किसी की ग़लतियों, किसी की ख़ामियों का नतीजा है. अब हर ऐसा क़दम उठाने की ज़रूरत है जिससे कि ऐसा संकट फिर कभी हमारे सामने पैदा न हो सके."
फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सार्कोज़ी की राय है कि वित्तीय क्षेत्र में कड़े नियमों के अलावा और कोई उपाय नहीं बचा है.
उन्होंने कहा, " हमारा मानना है कि कडे़ नियमों के बगैर बैंकों की साख नहीं लौटेगी और उसके बिना संकट से उबरना संभव नहीं है. इसीलिए कड़े नियमों के मामले पर हम कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं."
जानकार कहते हैं कि अमरीका को ये नापसंद है क्योंकि दशकों की अमरीकी व्यवस्था में ये सोच नदारद रही है.


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