जी-20 बैठक में उभरे मतभेद

जी-20 सम्मेलन से पहले लंदन में विरोध प्रदर्शनों के बीच विकसित सदस्य देशों में भी परस्पर गतिरोध उभर आए हैं. वहीं विकासशील देशों की भी अपनी चिंताएं हैं. बुधवार को लंदन में जिस तरह आर्थिक संकट व बैंकों की भूमिका से नाराज़, बढ़ती बेरोज़गारी और मंदी से परेशान लोगों के प्रदर्शन हुए, वो सिलसिला आज भी जारी रहने की उम्मीद है.
लेकिन लंदन में असल दंगल हो रहा होगा बंद कमरों में. बीबीसी के कूटनीतिक मामलों के संवाददाता जोनाथन मार्क्स इसे 'डिप्लोमैटिक स्पीड डेटिंग' की संज्ञा दे रहे हैं. गंभीर आर्थिक संकट के बीच अब यह लड़ाई है विचारधाराओं की और वर्चस्व की. सदस्य विकसित देशों के बीच बुधवार को खुलकर सामने आते गतिरोधों, असहमतियों ने सम्मेलन की शुरुआत से पहले ही ओले तो बरसा ही दिए हैं.
उधर भारत और उसके जैसे विकासशील देशों के लिए चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं मंदी के नाम पर विकसित देश अपने बाज़ारों को बंद करना न शुरू कर दें और इसीलिए गुरुवार को जब सम्मेलन में भारत अपना पक्ष रखेगा तो उसका ज़्यादा ध्यान इसी ओर होगा.
मूल चर्चा है आर्थिक संकट को लेकर लेकिन जब इस सम्मेलन में दुनिया के प्रमुख नेता इकट्ठा होंगे, उनकी आपस में मुलाकात होगी तो परमाणु हथियारों से लेकर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान की चर्चा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और नैटो की भूमिका जैसे कई मसलों पर चर्चा भी होगी.
आर्थिक संकट और असहमति
आर्थिक संकट की बात करें तो फ़्रांस और जर्मनी अर्थव्यवस्था के एंग्लो सैक्सन मॉडल को चुनौती देने के लिए एक होकर आए लगते हैं. पत्रकार अंशुमन तिवारी. भारत सबसे ज़्यादा प्रभावी तरीके से यह बात रखने की कोशिश करेगा कि अगर दुनिया के बाज़ारों को आर्थिक मंदी से उबारना है तो कृपया अपने अपने बाज़ारों को बंद न करें क्योंकि इससे सभी का नुकसान होगा
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जर्मनी की चाँसलर एंगेला मर्केल ने बुधवार को पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, "ये आर्थिक संकट शून्य से तो नहीं उपजा है. ये कोई प्रकृति प्रदत्त संकट भी नहीं है. साफ़ है ये किसी की ग़लतियों, किसी की ख़ामियों का नतीजा है. अब हर ऐसा क़दम उठाने की ज़रूरत है जिससे कि ऐसा संकट फिर कभी हमारे सामने पैदा न हो सके."
एंगेला मर्केल के सुर में सुर मिलाकर फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सार्कोज़ी बोले कि फ़ाइनेन्शियल रेग्युलेशन यानी वित्तीय क्षेत्र में कड़े नियमों के अलावा और कोई उपाय नहीं बचा है.
उन्होंने कहा, "जर्मनी और फ़्रांस दोनों चाहते हैं कि कड़े नियमों पर सब एकमत हों. कडे़ नियमों के बगैर बैंकों की साख लौटेगी नहीं और उसके बिना संकट से उबरना संभव नहीं है. इसीलिए कड़े नियमों के मामले पर हम कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं."
सार्कोज़ी और मर्केल कह रहे हैं कि बैंकों और हेज फ़ंड्स को खुली छूट न दी जाए, इनपर नकेल कसी जाए. जानकार कहते हैं कि अमरीका को ये कड़वी दवाई सख़्त नापसंद है क्योंकि दशकों की अमरीकी व्यवस्था में ये सोच नदारद रही है.
सवाल संरक्षणवाद का
एक और बड़ा मामला है संरक्षणवाद का. भारत और चीन चाहते हैं कि पश्चिमी देशों सहित आर्थिक संकट की मझधार में फँसे सभी देश आयात पर रोक और टैक्स न बढ़ाएँ.
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सम्मेलन के लिए लंदन पहुँचे भारत के वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी कहते हैं, "भारत सबसे ज़्यादा प्रभावी तरीके से यह बात रखने की कोशिश करेगा कि अगर दुनिया के बाज़ारों को आर्थिक मंदी से उबारना है तो कृपया अपने-अपने बाज़ारों को बंद न करें क्योंकि इससे सभी का नुकसान होगा."
यूरोपीय संघ और विश्व बैंक को भी चिंता है कि अगर वैसा हुआ तो दुनिया में व्यापार ठप्प हो जाएगा जो मंदी को बेहद गंभीर बना सकता है. पर अब नज़र इस बात पर है कि इस सिलसिले में फ़्राँस और अमरीका जैसे देश क्या कहते हैं, क्या राय रखते हैं.
गुरुवार को भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से भी मिल सकते हैं. बुधवार को ही ओबामा चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ से मिल चुके हैं और इस मुलाक़ात से स्पष्ट हो गया है कि दुनिया के आर्थिक मामलों में अमरीका चीन को महत्वपूर्ण साझेदार मान चुका है.
अब नज़र भारत पर है और देखना यह है कि ओबामा भारत को भी क्या उतना ही महत्व देकर चलते हैं, या फिर इससे कम... या ज़्यादा...


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