चुनावी मौसम में भी कटआउट उद्योग की हालत खस्ता
चेन्नई, 31 मार्च (आईएएनएस)। चुनावी खुमार चढ़ने के साथ ही शबाब पर रहने वाला राज्य का कटआउट निर्माण उद्योग अब धीमी मौत की ओर अग्रसर है।
दरअसल, कंप्यूटर के आ जाने से राजनीतिज्ञों और सिने सितारों के हाथ से बने कटआउट की मांग बेहद कम हो गई है जिसकारण इस उद्योग से जुड़े लोगों को जीवन यापन करने में मुश्किलें आ रही है।
कंप्यूटर से बनने वाले विनाइल होर्डिग्स को किसी भी आकार प्रकार में तैयार करने की आजादी ने पेंटरों और लकड़ी का काम करने वाले लोगों की बेरोजगारी में अहम भूमिका निभाई है।
हालांकि इस संबंध में आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन सूत्रों के मुताबिक कभी राज्य में 50 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाले इस उद्योग में नाटकीय गिरावट आई है।
कटआउट उद्योग से जुड़े एन. मारिचामी ने आईएएनएस को बताया, "हम 15 फीट और उससे ऊंचे कटआउट बनाया करते थे। कई बार तो हमने 40 फीट तक ऊंचे कटआउट बनाए।"
उन्होंने बताया कि एक समय व्यस्त सीजन में इस काम से रोजाना 1,500 रुपये तक की आय होती थी लेकिन अब वह मकानों और भवनों की रंगाई करके काम चलाते हैं जिससे बमुश्किल प्रतिदिन 200 रुपये तक की ही आय हो पाती है।
यद्यपि विनाइल होर्डिग के कारोबारी भी खुश दिखाई नहीं पड़ते। विनाइल कटआउट के कारोबारी ए.स्टीफन जॉन ने आईएएनएस से कहा, "निर्वाचन आयोग और स्थानीय निकायों द्वारा बनाए गए नियम कड़े हैं। एक ओर जहां राजनीतिक होर्डिग और कटआउट एक दिन से ज्यादा के लिए नहीं होते वहीं मल्टीप्लेक्सों में सिनेमा भी तीन सप्ताह से अधिक नहीं टिकते।" इस कारण निर्माता या जरूरतमंद महंगे कटआउट बनवाने से बचते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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