'सपा को हम सहयोगी दल मानते हैं'

'सपा को हम सहयोगी दल मानते हैं'

इस सिलसिले में सोमवार को दिन भर लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दिल्ली से आये हुए पार्टी महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह प्रदेश के नेताओं से विचार विमर्श करते रहे.

वहीँ पर उन्होंने एक ख़ास बातचीत की हमारे संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से

क्या उत्तर प्रदेश में इतनी माथापच्ची रंग लाएगी और कांग्रेस पिछले चुनाव में जीती गयी अपनी नौ सीटें भी बचा सकेगी?

हम लोग चुनाव जीतने के लिए लड़ रहे हैं और उसमे कोशिश यही रहेगी कि जहाँ जहाँ लड़े वो सभी सीट हम जीतें. अब स्ट्राइक रेट और जीतने की संख्या क्या होती है,ये कह पाना अभी मुश्किल है, लेकिन ये ज़रूर है की हम पूरी ईमानदारी और दम ख़म के साथ ही लडेंगे.

अभी तक तो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के लिए 56 उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. अभी क्या और भी उम्मीदवारों के नाम बाकी हैं?

हो सकता है कि हमलोग और 10-12 सीटों के लिए लड़े और उनके नाम घोषित करें.

तीन मार्च को लखनऊ में एक बड़ा जमावडा होने वाला है जिसमें लालू यादव, राम विलास पासवान और मुलायम सिंह यादव एक मंच पर घोषणा करने जा रहे हैं की वो साथ साथ हैं और आगामी चुनावों में एक दूसरे के खिलाफ नहीं लडेंगे.आपको नहीं लगता कि कांग्रेस पार्टी, जिसके समाजवादी पार्टी से घनिष्ठ संबंध थे, उसने अपने तीखे तेवरों के चलते मुलायम सिंह यादव को एक तश्तरी में रख कर लालू और रामविलास के सामने परोस दिया?

ऐसा नहीं है.लालू यादव, मुलायम सिंह और रामविलास पासवान, ये सब सोशलिस्ट पार्टी में थे फिर जनता पार्टी में आये तो जनता दल बना. फिर जनता दल में बिखराव हुआ- एक ने समाजवादी पार्टी बनायीं, एक ने राष्ट्रीय जनता दल बनाई और एक ने लोकजनशक्ति पार्टी का गठन किया. पहले से भी ये लोग एक साथ रहते आए हैं. कांग्रेस पार्टी ने सेकुलर फ्रंट का गठन किया जिसकी सरकार आज दिल्ली में है. हमारी तरफ से कोशिश हमेशा यही रही की हम सभी को मिलाकर चुनाव लड़े. लेकिन होता यही है की हर राजनितिक दल अधिक से अधिक अपना प्रभाव बनाना चाहता है, और इसमें किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए. उत्तर प्रदेश में हमारी कोशिश थी की हम समाजवादी पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़े. लेकिन सहमति नहीं हो पाई. पांच-सात सीटें केवल ऐसी थी जहाँ हम उनसे अनुरोध करते थे की हम भी चुनाव लड़े और वो भी जबकि बाकी सीटों के लिए आसानी से समझौता हो सकता था, लेकिन नहीं हो सका. खैर अब हम लोग अपने तरीके से चुनाव लडेंगे और चुनाव के बाद इसपर चर्चा होगी की पोस्ट-पोल समझौता हो सकता है क्या.

क्या इससे आपको ये नहीं लगता की मुलायम सिंह ने आपको एक तरह से आखिरी समय पर धोखा दिया जबकि दूसरी तरफ मुलायम खुद कह रहे हैं की आपकी पार्टी ने उनको नीचा दिखाया

मैं उनकी इस बात पर एकदम इत्तेफाक नहीं रखता लेकिन साथ ही मैं इस बात पर कोई टिप्पणी भी नहीं करना चाहता हूँ.

बात अगर वरुण गाँधी के कथित बयान से उठे विवाद की करूँ तो शुरुआत में आपकी पार्टी यानी कांग्रेस ने जम कर इस मुद्दे को उठाया. उस दौरान तो ऐसा लग रहा था की ये मुद्दा भाजपा बनाम कांग्रेस है. लेकिन अब वरुण मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है क्योंकि उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने वरुण के खिलाफ चार और एआईआर दायर करने के साथ साथ रासुका भी लगा दी है. अब तो ऐसे ही लगता है की कांग्रेस को एक नयी सहयोगी यानी मायावती और उनकी बसपा मिल गयी है.

पहली बात तो मैं यही कहना चाहूँगा कि जो वरुण ने कहा वो उनसे कहलवाया गया है, उन लोगों के द्वारा जिनकी मानसिकता सांप्रदायिक है. जिनकी मानसिकता धार्मिक उन्माद फैलाने की है और हिन्दू मुसलमान के बीच खाई पैदा करने की है. हमारी लडाई किसी व्यक्ति नहीं बल्कि विचारधारा से है. समाज का विघटन करने की विचारधारा के खिलाफ हमारी लडाई है. भारतीय जनता पार्टी लोगों को तोड़ती है और कांग्रेस लोगों को जोड़ने को काम करती है.

आखिरी में अगर आपसे पूछूँ की उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की प्रतिद्वंदी पार्टियों में से आपकी राय में कौन कहाँ पर है और सबसे अहम् तीन प्रतिद्वंदी कौन कौन से हैं.

उत्तर प्रदेश में हमारी लडाई नंबर एक तो भाजपा से है और दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी है.

तो क्या समाजवादी पार्टी से आपका कोई लडाई नहीं है भई चुनाव तो हम उनके खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन सपा ने हमें केंद्र सरकार में मदद की है, इसलिए उन्हें हम अपना सहयोगी ही मानते हैं.

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