हमें वाक् युद्ध नहीं बहस चाहिए!

Beyond the Manmohan versus Advani
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के बीच चले वाक् युद्ध में मीडिया ने खासी दिलचस्पी दिखाई। भारतीय राजनीति के संदर्भ में ये आरोप-प्रत्यारोप महज राजनीतिक बयानबाजी से कहीं ज्यादा गहरे अर्थ रखते हैं।

आम तौर पर काफी शिष्ट और विनम्र माने जाने वाले मनमोहन सिंह ने भाजपा नेता को बतौर गृहमंत्री विफल करार दिया और बाबरी मसजिद का विध्वंस उनकी 'एकमात्र उपलब्धि' बताई।

वहीं इस दौरान आडवाणी अपने भाषणों में पूरे समय मनमोहन को एक कमजोर प्रधानमंत्री साबित करने में लगे रहे। उन्होंने कहा कि मनमोहन अब तक के सबसे कमजोर पीएम हैं जो अपने सारे फैसले पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी के इशारों पर करते हैं।

इन आरोपों-प्रत्यारोपों को देखते-सुनते कई बार मन में सवाल उठता है, क्या बेहतर होता यदि प्रधानमंत्री पद के ये दो दावेदार इस बात पर चर्चा करते कि सत्ता में आने के बाद अगले पांच वर्षों के लिए उनकी क्या योजनाएं होंगी?

अब वक्त आ गया है कि हमें अमेरिका की तरह चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों को एक बड़ी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाना चाहिए। टेलीविजन के माध्यम से संभव इस बहस में अर्थव्यवस्था से जुड़ी उनकी योजनाएं, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उनके विचार जनता तक पहुंचने चाहिए।

भारत का टेलीविजन दर्शक इस तरह की बहसों के लिए काफी परिपक्व हो चका है।

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