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'बेरोज़गारी रोकने को भी प्राथमिकता दें'

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Japao Trabalho

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अमीर देशों से अपील की है कि वे वित्तीय संस्थाओं को बचाने के साथ ही बेरोज़गारी रोकने के उपायों को भी पर्याप्त प्राथमिकता दें.

संस्था का कहना है कि आर्थिक मंदी से निपटने के लिए अब तक जो प्रयास हुए हैं वो बेहद असंतुलित हैं. उसका मानना है कि बेरोज़गारी से बचने के लिए उतना समय और पैसा ख़र्च नहीं किया जा रहा है जितना कि बैंकों को बचाने के लिए किया जा रहा है.

आईएलओ ने जनवरी में ही चेतावनी दी थी कि आर्थिक मंदी के कारण पाँच करोड़ लोगों की नौकरियाँ जा सकती हैं. आईएलओ की यह अपील ऐसे समय में जारी हुई है जब दुनिया के विकसित और विकासशील देशों के संगठन जी20 की बैठक की तैयारियाँ हो रही हैं. यह बैठक अप्रैल के पहले सप्ताह में लंदन में होने वाली है.

सुझाव

अब तक कई लाख करोड़ डॉलर के कई आर्थिक पैकेज देने की घोषणा की जा चुकी है.अब आईएलओ के एक अध्ययन से पता चला है कि है कि अब तक ऐसे 40 पैकेज घोषित किए जा चुके हैं. इसमें सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह है कि इनमें से ज़्यादातर पैसा वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए दिया गया है.

हम सब जानते हैं कि वित्तीय संगठनों को बचाना ज़रुरी है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसे किसी विकल्प के रुप में चुनना ज़रुरी है. हम वित्तीय संगठनों को चलाने की कोशिश करते हुए लोगों के बारे में भी सोच सकते हैं जुआन सोमाविया, महानिदेशक, आईएलओ

हम सब जानते हैं कि वित्तीय संगठनों को बचाना ज़रुरी है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसे किसी विकल्प के रुप में चुनना ज़रुरी है. हम वित्तीय संगठनों को चलाने की कोशिश करते हुए लोगों के बारे में भी सोच सकते हैं

आईएलओ का कहना है कि इसमें से सिर्फ़ दस प्रतिशत राशि रोज़गार के अवसर पैदा करने और सामाजिक सुरक्षा के लिए खर्च की गई है.आईएलओ के महानिदेशक जुआन सोमाविया का कहना है कि यह तरीक़ा अदूरदर्शी है.

उनका कहना है, "हम सब जानते हैं कि वित्तीय संगठनों को बचाना ज़रुरी है लेकिन ऐसा नहीं है कि इसे किसी विकल्प के रुप में चुनना ज़रुरी है. हम वित्तीय संगठनों को चलाने की कोशिश करते हुए लोगों के बारे में भी सोच सकते हैं."

आईएलओ का कहना है कि जब तक रोज़गार पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाएगा, वास्तविक आर्थिक सुधार नहीं हो सकता बल्कि इससे लंबे समय के लिए बेरोज़गारी और ग़रीबी की समस्या पैदा हो जाएगी.

इसीलिए जुआन सोमाविया ज़ोर देकर कह रहे हैं जी20 देशों को आर्थिक मंदी से निपटने के अपने उपायों पर फिर से विचार करना चाहिए. उनका कहना है, "वित्तीय व्यवस्था को चलाते रहना ज़रुरी है लेकिन नौकरी, लोग, परिवार और समाज भी ज़रुरी है और हमें अपनी प्राथमिकताएँ तय करनी होंगीं."

एक अनुमान है कि अगले दो सालों में कोई नौ करोड़ लोग रोज़गार की तलाश में होंगे और इनमें से ज़्यादातर युवा होंगे.

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