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मेघालय में राष्ट्रपति शासन लगाने पर केंद्र को सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस

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प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता पी. ए. संगमा और मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री डोंकूपर रॉय की राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को भी नोटिस भेजा है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।

केन्द्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए दोनों नेताओं ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर विधानसभा को सिर्फ इसलिए निलंबित रखा गया है ताकि कांग्रेस अपनी सरकार बना सके।

मेघालय में सत्तारूढ़ मेघालय प्रोग्रेसिव एलायंस (एमपीए) ने 60 सदस्यीय राज्य विधानसभा में विश्वास मत जीत कर अपनी सरकार बचा ली थी। इसके दो दिनों बाद ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।

भारी नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के बीच हुए विगत 17 मार्च को हुए विश्वास मत के दौरान एमपीए को महज एक वोट से जीत हासिल हुई थी, वह भी विधानसभा अध्यक्ष बिंदो लानोंग के वोट से।

विश्वास मत के दौरान 27 विधायकों ने सत्तारूढ़ एमपीए के समर्थन में और 27 ही विधायकों ने सरकार के विरोध में मतदान किया था। आंकड़ा बराबरी पर छूटने के पर अंत में विधानसभा अध्यक्ष ने अपना निर्णायक वोट डाला और घोषणा की कि एमपीए ने एक वोट से विश्वास मत जीत लिया।

इससे पहले, एमपीए से समर्थन वापस लेने वाले पांच विधायकों को मतदान से वंचित रहना पड़ा था क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष ने इन पांचों के खिलाफ 'अंतरिम निलंबन' का आदेश जारी किया था।

इन पांच विधायकों में पूर्व मंत्री एडवाइजर पेरियोंग और पॉल लिंग्दोह, उपाध्यक्ष सनबार शुलई, और दो निर्दलीय विधायक इस्माइल मराक और लिमिसन संगमा शामिल हैं।

मेघालय विधानसभा में इन पांचों विधायकों द्वारा सत्तारूढ़ गठबंधन से नाता तोड़ लेने से एमपीए सरकार अल्पमत में आ गई थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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