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संघ में व्यापक बदलाव की शुरुआत

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संघ में व्यापक बदलाव की शुरुआत

कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन ने अपने जीते-जी मोहन भागवत को सरसंघचालक बना तो दिया पर वो ऐसे पहले सरसंघचालक रहे जो पद छोड़ने को तैयार नहीं थे.

उनके सहयोगियों ने उन पर अपना उत्तराधिकारी घोषित करने के लिए दबाव डाला. ऐसा संघ में पहली बार हुआ है.

सुदर्शन के हटने के कई कारण हैं. पिछला एक दशक भारतीय राजनीति में गठबंधन का दशक रहा. इस दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेतृ़त्व की सरकार आई और उससे संघ के स्वयंसेवकों में गहरी वैचारिक निराशा पैदा हुई.

वो निराशा इतनी बढ़ गई कि संघ बिखराव के कगार पर पहुँच रहा था. उसे रोकने के लिए नेतृत्व परिवर्तन ज़रूरी था. इस सिलसिले में विचार 2004 से ही शुरू हो गया था.

इसमें कोई विवाद नहीं है कि ऐसी परिस्थितियों में सुदर्शन सक्षम साबित नहीं हुए.

वो बार-बार ख़ुद के लिए विवाद खड़ा कर देते थे और संघ के लिए विचित्र स्थिति बन जाती थी.

ग़लत फ़ैसला

सुदर्शन शायद पहले सरसंघचालक थे जिनसे उनकी टीम के लोग ही कहते थे कि आप कम बोलिए या मत बोलिए.

विवाद खड़ा होने पर वो बार-बार अपना बयान बदलने या खंडन करने पर मजबूर हुए.

ये धारणा बन चुकी थी कि सुदर्शन जी बोलते ज़्यादा हैं और उसके अनुरूप संगठन को साथ लेकर चलने की उनकी क्षमता नहीं है.

ऐसे में उनको हटाने के सिवाय संघ के सामने कोई दूसरा रास्ता था नहीं.

इस स्थिति के लिए पूर्व सरसंघचालक प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भइया) भी ज़िम्मेदार थे. संघ नेतृत्व में एक बड़ा तबक़ा जानता था कि रज्जू भइया सुदर्शन को सरसंघचालक बनाने का फ़ैसला करेंगे.

उन्होंने रज्जू भैया को समझाने की कोशिश की कि वो ये फ़ैसला न करें. लेकिन रज्जू भैया ने फ़ैसला किया और लोगों ने इसे माना.

समय ने ये साबित कर दिया कि उनका फ़ैसला ग़लत था.

बदलाव की आहट

मोहन भागवत के सरसंघचालक बनने से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भीतरी और बाहरी बदलाव तय है.

पिछले कुछ वर्षों में संघ विचारधारा की उहापोह में पड़ गया था. मोहन भागवत के नेतृत्व में अब वो ज़्यादा स्पष्ट रूप से हिंदुत्व की बात करेगा.

संघ में हुआ बदलाव संघ और उससे जुड़े संगठनों में बदलाव की शुरुआत भी है.

भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की राजनीति में पड़ी हुई है और उसने विचारों से समझौता किया है. अब इस लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी नेतृत्व में भी बदलाव होगा.

ये धारणा बन चुकी थी कि सुदर्शन जी बोलते ज़्यादा हैं और उसके अनुरूप संगठन को साथ ले चलने की उनकी क्षमता नहीं है

ये धारणा बन चुकी थी कि सुदर्शन जी बोलते ज़्यादा हैं और उसके अनुरूप संगठन को साथ ले चलने की उनकी क्षमता नहीं है

भारतीय जनता पार्टी के जो नेता मोहन भागवत की कसौटी पर खोटे साबित हुए हैं उनके दिन अब बहुत ही कम बचे हुए हैं.

लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह जैसे नेता अब सिर्फ़ सजावटी नेता रह जाएँगे. बीजेपी में अब अरुण जेटली, बाल आप्टे और नरेंद्र मोदी का दौर आ रहा है.

संघ और हिंदुत्व की विचारधारा में आस्था रखने वालों को उम्मीद है कि मोहन भागवत के नेतृत्व में भारत की राजनीति हिंदुत्व की धुरी पर चलेगी.

भागवत को विचार के साथ साथ संगठनकर्ता भी माना जाता है. अब व्यवहार और संघ की व्यवस्था में मोहन भागवत मार्गदर्शक भी होंगे और नेता भी.

उम्मीद

इस मायने में वो पहले के सरसंघचालकों से थोड़ा भिन्न होंगे. मोहन भागवत को विचार और संगठन दोनों का व्यक्ति माना जाता है. उनमें डॉक्टर हेडगेवार और गुरूजी की छवि देखी जाती है.

डॉक्टर हेडगेवार जैसी मूँछों के कारण भी ये छवि बनी है पर विचार और टीम भावना बनाए रखने में वो भी उन्हें बेजोड़ माना जाता है.

संघ के भीतर भी बड़े परिवर्तन की हलचल है.

लोगों को उम्मीद थी कि सह-सरकार्यवाह का प्रभार देख रहे सुरेश सोनी या मदनदास देवी संगठन के प्रमुख यानी सरकार्यवाह बनेंगे. लेकिन इस पद पर लाए गए हैं भैयाजी जोशी.

हाशिए पर

संघ में शुरू हुई बदलाव की ये शुरुआत हुई है जो दूर तक जाएगी. मदनदास देवी जैसे लोगों को भी किनारे किया गया है.

औचित्य के हिसाब से देखें तो मदनदास को सरकार्यवाह होना चाहिए. वो सह सरकार्यवाह का पद सँभाल रहे थे.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में मदनदास संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच समन्वय का काम करते थे.

सुरेश सोनी और वो समकक्ष थे. पर दोनों में से ये पद किसी को नहीं दिया गया. अब देखना ये है कि भैयाजी जोशी इन दोनों पुराने स्वयंसेवकों को अपनी टीम में रखते हैं या नहीं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए सरसंघचालक के लिए आने वाले दिन बेहद चुनौतीपूर्ण होंगे.

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