नैनो को लेकर उत्साह भी, चिंताएँ भी

इसकी शुरुआत हो रही है नैनो से जिसे बनाया है टाटा मोटर्स ने. सोमवार को मुंबई में एक रंगारंग समारोह में नैनो को बाज़ार में उतारा जाएगा.
एक लाख रुपये की लागत वाली इस छोटी गाड़ी को जनता कार का नाम दिया जा रहा है.
नैनो कार के आने पर देश में उसी तरह का उत्साह दिखाई दे रहा है जैसा मारुति के पहली बार आने पर दिखाई दिया था.
नैनो का दाम कम होने के कारण मोटरबाइक की जगह लोग इस गाड़ी को खरीदेंगे. बाइक के लिए ऋण कम मिलते हैं, लेकिन गाड़ी को बैंक एक संपत्ति के रूप से देखते हैं इसलिए नैनो के ख़रीदारों को कर्ज़ भी आसानी से मिल जायेगा. कपिल भसीन
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23 वर्षीय कपिल भसीन नैनो आने से उत्साहित होकर कहते हैं ये एक अच्छा क़दम है, "नैनो का दाम कम होने के कारण मोटरबाइक की जगह लोग इस गाड़ी को खरीदेंगे. बाइक के लिए ऋण कम मिलते हैं, लेकिन गाड़ी को बैंक एक संपत्ति के रूप से देखते हैं इसलिए नैनो के ख़रीदारों को कर्ज़ भी आसानी से मिल जायेगा."
कपिल के अनुसार छोटी गाड़ियों के दो और फायदे हैं, "छोटी गाड़ी होने के कारण पार्किंग ज़्यादा आसानी से मिला करेगी और इससे सड़क पर हादसे भी कम होंगे"
चिंता भी
लेकिन मुंबई में नैनो के प्रभाव को लेकर चिंता भी है. 24 वर्षीय अंकुर अग्रवाल मुंबई के एक बैंक में काम करते हैं और मुंबई की भीड़भाड़ वाली सड़कों से गुज़रकर घर से अपने दफ्तर जाते हैं.
पहले ही भारत के शहरों में ट्रैफ़िक की बुरी स्थिति है, नैनो जैसी सस्ती कारों के आगमन के बार स्थिति और बिगड़ने की आशंका
अंकुर का कहना है कि मुंबई के ट्रैफ़िक से वो पहले से परेशान रहते हैं, अब नैनो के आने से शहर का ट्रैफ़िक और भी ख़राब हो जायेगा.
अंकुर कहते हैं, "मैं एक छोटे शहर से आता हूँ जहाँ सड़कें और फ़लाइओवर कम होते हैं. नैनो ज़्यादा उन्हीं शहरों में बिकेंगी, जिसके कारण इन शहरों में भीड़भाड़ और भी बढ़ जायेगी. दूसरी ओर बड़े शहरों में भी पार्किंग की कमी के कारण समस्या बढ़ जायेगी"
अंकुर का इशारा देश में ट्रैफ़िक के कमज़ोर ढाँचे की तरफ है. अब मुंबई का उदाहरण लें तो पता चलता है की यहाँ हर पाँचवें व्यक्ति के पास या तो गाड़ी है या बाइक. लेकिन अधिकतर गाड़ियों के लिए पार्किंग उपलब्ध नहीं है.
यूरोप से तुलना
यूरोप के सभी बड़े शहरों में बहुमंज़िली पार्किंग सुविधाएँ हैं, लेकिन मुंबई में इस तरह की पार्किंग की सुविधाएं इक्का-दुक्का जगहों पर ही उपलब्ध हैं. इसके इलावा यहाँ की सड़कें काफ़ी तंग और ख़राब हाल में हैं. दूसरी तरफ सड़कों पर ट्रैफ़िक चिन्ह और ट्रैफ़िक लाइट्स भी बहुत कम हैं.
यही हाल है देश के अन्य शहरों और कस्बों का. और शायद इन्हीं कारणों से भारत में हर साल एक लाख से अधिक लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं. भारत सरकार के अनुसार दुनिया में सड़क घटनाओं में हर साल मरने वालों की संख्या सबसे अधिक भारत में है.
दूसरी तरफ ट्रैफ़िक पुलिस की संख्या बड़े शहरों में कम होने के कारण ट्रैफ़िक का निज़ाम अधिकतर चौपट रहता है. इसके इलावा ट्रैफ़िक पुलिस वालों के विरुद्ध रिश्वत लेकर क़ायदे-क़ानून तोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई न करने का इल्जाम है जिसके कारण भी सड़कों पर ट्रैफ़िक गड़बड़ रहती है.
आप लोगों की इच्छाओं को मार नहीं सकते. बड़े शहर अभी इसके लिए फ़िलहाल तैयार नहीं हैं. लेकिन कहीं-न-कहीं इसकी शुरुआत करनी पड़ती है. दिलीप छाबरिया
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ऐसा माना जा रहा है कि नैनो सस्ती गाड़ी होने के कारण कम आय के लोग भी भारी संख्या में इसे खरीदेंगे. तो क्या इस परिस्थिति में नैनो जैसी छोटी गाड़ियों से समस्या और बढ़ने कर ख़तरा है?
दिलीप छाबरिया वाहनों के एक जाने माने विशेषज्ञ हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी ऑनलाइन को बताया कि नैनो जैसी छोटी गाड़ियों के आने के बाद ही अधिकारी ढांचों को बेहतर करने की तरफ ध्यान देंगे जैसा कि यूरोप में हुआ था. टाटा मोटर्स के बाद अब फ़ोर्ड ने भी छोटी गाड़ियों के निर्माण की तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है.
छाबरिया नैनो और छोटी गाड़ियों का स्वागत करते हैं, "आप लोगों की इच्छाओं को मार नहीं सकते. बड़े शहर अभी इसके लिए फ़िलहाल तैयार नहीं हैं. लेकिन कहीं-न-कहीं इसकी शुरुआत करनी पड़ती है."
सबकी पहुँच में कार
निशांत इदनानी मुंबई में एक बैंक के मैनेजर हैं. वो इस बात से असहमत हैं की कम आमदनी वालों को गाड़ियों से वंचित रखा जाये, "जिन लोगों की आमदनी कम है उन्हें गाड़ी चलाने से मना क्यों कर रहे हो. बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना अलग बात है, लेकिन नैनो के रिलीज़ से आपत्ति नहीं होनी चाहिए."
जिन लोगों की आमदनी कम है उन्हें गाड़ी चलाने से मना क्यों कर रहे हो. बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना अलग बात है, लेकिन नैनो के रिलीज़ से आपत्ति नहीं होनी चाहिए निशांत इदनानी
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मुंबई के एक युवक पवन देवकुले का मानना है कि गाड़ी चाहे छोटी हो या बड़ी, बड़े शहरों में भारी ट्रैफ़िक तो वैसे ही आम बात है और मुंबई जैसे शहर में लोग इसके आदी हो चुके हैं. वो यह भी कहते हैं की छोटी गाडियों को ट्रैफ़िक की समस्याओं और सड़क हादसों को जिम्मेवार नहीं ठहराना चाहिए.
उनकी सलाह है की बड़ी गाड़ियों के बजाय लोगों को छोटी गाडियां खरीदनी चाहिए ताकि पार्किंग की समस्या दूर हो. उनका कहना है की सड़क हादसों की वजह ज्यादा गाडियाँ नहीं, बल्कि तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चलाना और ट्रैफिक क़ानून का उल्लंघन किया जाना है.
कुछ लोगों का मानना है कि सरकार ढांचों पर ध्यान तो दे ही साथ ही सड़क हादसों को कम करने के लिए ट्रैफ़िक संबंधी नियमों को मज़बूत भी करे. कुछ साल पहले भारत सरकार द्वारा संगठित सुंदर कमिटी की रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि केंद्र और राज्यों के स्तर पर रोड सेफ्टी बोर्ड गठित किये जाएं. इस कमिटी की सिफ़ारिशों पर रोड सेफ्टी बिल तैयार किया गया लेकिन अब तक इसे संसद में पेश नहीं किया गया है.
शायद नैनो और दूसरी छोटी गाड़ियों के सड़कों पर आने के बाद सरकार इस मामले को गंभीरता से ले.


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