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मोहन भागवत बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए प्रमुख (राउंडअप)

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोहनराव भागवत को संघ का नया प्रमुख बनने पर शुभकामना दी है।

59 वर्षीय भागवत संघ के छठे सरसंघचालक बने हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र के चंद्रपुर में 11 सितम्बर 1950 को हुआ। उन्होंने अकोला के पंजाबराव कृषि विद्यापीठ से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक की डिग्री हासिल की। भागवत के पिता भी संघ से जुड़े थे और हेडगेवार के कार्यकाल के दौरान ही वे संघ में शामिल हुए थे। भागवत को संघ में ले जाने वाले उनके पिता ही थे।

संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सुदर्शन ने पद छोड़ने की इच्छा जताई। बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वह खराब स्वासथ्य के चलते इस पद से जुड़ी जिम्मेदारियां, जिनमें लगातार देश भर में प्रवास शामिल है, नहीं निभा सकते हैं इसलिए उन्हें इस जिम्मेदारी से मुक्त किया जाना चाहिए।

संघ की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया, "सुदर्शन ने बढ़ती उम्र और अस्वस्थता का हवाला देते हुए सर संघचालक पद से मुक्त होने की घोषणा की। उन्होंने मोहन भागवत को नया सर संघचालक नियुक्त किया है।"

भागवत की नियुक्ति को संघ में युवाओं को आगे लाने के रूप में देखा जा रहा है। संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार के बाद भागवत संघ के दूसरे सबसे युवा सर संघचालक हैं। हेडगेवार ने 1925 में 36 वर्ष की उम्र में आरएसएस की स्थापना की थी। गौरतलब है कि संघ के ज्यादातर मौजूदा वरिष्ठ पदाधिकारी भागवत से अधिक उम्र के हैं।

भागवत लगभग 30 वर्षो से संघ में 'प्रचारक' के नाते अलग-अलग पदों पर काम करते रहे हैं। ज्ञात हो कि संघ में 'प्रचारक' का दर्जा उन कार्यकर्ताओं को दिया जाता है जो अवविाहित रहकर पूर्णकालिक रूप से संगठन के लिए काम करते हैं।

आरएसएस के एक वरिष्ठ प्रचारक जिन्होंने भागवत के साथ काम भी किया है, ने नई दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत में कहा, "नए सरसंघचालक स्पष्टवादी हैं। वह संघ को दलगत राजनीति से दूर रखने के पक्ष में रहे हैं। उन्होंने हमेशा संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया है। "

स्वास्थ्य कारणों से संघ प्रमुख का पद छोड़ने वाले सुदर्शन तीसरे सर संघचालक हैं। उनसे पहले बालासाहब देवरस और राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ने भी अस्वस्थता का हवाला देते हुए पद छोड़ा था।

हाल के वर्षो में आरएसएस की कमान संभालने वालों में सुदर्शन अपने बयानों के कारण सबसे विवादास्पद संघ प्रमुख रहे हैं।

सरसंघचालक रहते हुए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना की थी, उन्होंने संविधान के मूल आधार को ही बदलने की बात भी कही थी।

मुसलमानों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर हिन्दू औरतों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की उनकी सलाह भी विवादों में रही।

पशु चिकित्सक से प्रचारक और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक बने मोहन भागवत को उनकी स्पष्टवादिता के लिए जाना जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे संघ को दलगत राजनीति से दूर रखने के पक्षधर हैं।

भागवत स्नातकोत्तर की पढ़ाई बीच में ही छोड़ वे 1975 में उन दिनों संघ से जुड़े जब देश आपातकाल का सामना कर रहा था। आपातकाल के दिनों में उन्होंने भूमिगत रहकर अकोला में प्रचारक की भूमिका बखूबी निभाई। बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्र का भी प्रचारक बना दिया गया। इसके बाद, उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचारक के रूप में काम किया और संघ में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया।

वर्ष 2000 में राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया और एच. वी. शेषाद्रि ने क्रमश: सरसंघचालक और सरकार्यवाह के पद से मुक्त होने की इच्छा जताई, तो कुप्प. सी. सुदर्शन को सरसंघचालक और भागवत को सरकार्यवाह नियुक्त किया गया।

इस बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोहनराव भागवत को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नया प्रमुख बनने पर शुभकामना दी है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भागवत संघ को उसकी उत्कृष्ट परम्परा के अनुरूप समाज के विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठ राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन का एक नया आयाम प्रदान करेंगे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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