मोहन भागवत : पशु चिकित्सक से प्रचारक और अब 'संघ प्रमुख'
नई दिल्ली, 21 मार्च (आईएएनएस)। पशु चिकित्सक से प्रचारक और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक बने मोहन भागवत को उनकी स्पष्टवादिता के लिए जाना जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे संघ को दलगत राजनीति से दूर रखने के पक्षधर हैं।
59 वर्षीय भागवत संघ के छठे सरसंघचालक बने हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र के चंद्रपुर में 11 सितम्बर 1950 को हुआ। उन्होंने अकोला के पंजाबराव कृषि विद्यापीठ से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक की डिग्री हासिल की।
उनके पिता भी संघ के ही प्रचारक थे। उनसे प्रभावित होकर वे भी संघ के सानिध्य में आए। स्नातकोत्तर की पढ़ाई बीच में ही छोड़ वे 1975 में उन दिनों संघ से जुड़े जब देश आपातकाल का सामना कर रहा था।
आपातकाल के दिनों में उन्होंने भूमिगत रहकर अकोला में प्रचारक की भूमिका बखूबी निभाई। बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्र का भी प्रचारक बना दिया गया।
इसके बाद, उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचारक के रूप में काम किया और संघ में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया।
वर्ष 2000 में राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया और एच. वी. शेषाद्रि ने क्रमश: सरसंघचालक और सरकार्यवाह के पद से मुक्त होने की इच्छा जताई, तो कुप्प. सी. सुदर्शन को सरसंघचालक और भागवत को सरकार्यवाह नियुक्त किया गया।
नागपुर में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में शनिवार को भागवत को सरसंघचालक नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति को संघ में अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का प्रयास माना जा रहा है।
संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार के बाद भागवत संघ के दूसरे सबसे युवा सर संघचालक हैं। हेडगेवार ने 1925 में 36 वर्ष की उम्र में आरएसएस की स्थापना की थी। गौरतलब है कि संघ के ज्यादातर मौजूदा वरिष्ठ पदाधिकारी भागवत से अधिक उम्र के हैं।
आरएसएस के एक वरिष्ठ प्रचारक जिन्होंने भागवत के साथ काम भी किया है, ने नई दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत में कहा, "नए सरसंघचालक स्पष्टवादी हैं। वह संघ को दलगत राजनीति से दूर रखने के पक्ष में रहे हैं। उन्होंने हमेशा संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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