मोहन भागवत नए संघ प्रमुख, सुदर्शन ने छोड़ा पद (लीड-1)
संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सुदर्शन ने आज पद छोड़ने की इच्छा जताई। बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वह खराब स्वासथ्य के चलते इस पद से जुड़ी जिम्मेदारियां, जिनमें लगातार देश भर में प्रवास शामिल है, नहीं निभा सकते हें इसलिए उन्हें इस जिम्मेदारी से मुक्त किया जाना चाहिए।
संघ की ओर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया, "सुदर्शन ने बढ़ती उम्र और अस्वस्थता का हवाला देते हुए सर संघचालक पद से मुक्त होने की घोषणा की। उन्होंने मोहन भागवत को नया सर संघचालक नियुक्त किया है।"
भागवत की नियुक्ति को संघ में युवाओं को आगे लाने के रूप में देखा जा रहा है। संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार के बाद भागवत संघ के दूसरे सबसे युवा सर संघचालक हैं। हेडगेवार ने 1925 में 36 वर्ष की उम्र में आरएसएस की स्थापना की थी। गौरतलब है कि संघ के ज्यादातर मौजूदा वरिष्ठ पदाधिकारी भागवत से अधिक उम्र के हैं।
भागवत लगभग 30 वर्षो से संघ में 'प्रचारक' के नाते अलग-अलग पदों पर काम करते रहे हैं। ज्ञात हो कि संघ में 'प्रचारक' का दर्जा उन कार्यकर्ताओं को दिया जाता है जो अवविाहित रहकर पूर्णकालिक रूप से संगठन के लिए काम करते हैं।
भागवत का जन्म महाराष्ट्र में नागपुर के निकट चंद्रपुर नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता भी संघ से जुड़े थे और हेडगेवार के कार्यकाल के दौरान ही वे संघ में शामिल हुए थे। भागवत को संघ में ले जाने वाले उनके पिता ही थे।
आरएसएस के एक वरिष्ठ प्रचारक जिन्होंने भागवत के साथ काम भी किया है, ने नई दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत में कहा, "नए सरसंघचालक स्पष्टवादी हैं। वह संघ को दलगत राजनीति से दूर रखने के पक्ष में रहे हैं। उन्होंने हमेशा संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया है। "
स्वास्थ्य कारणों से संघ प्रमुख का पद छोड़ने वाले सुदर्शन तीसरे सर संघचालक हैं। उनसे पहले बालासाहब देवरस और राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ने भी अस्वस्थता का हवाला देते हुए पद छोड़ा था।
हाल के वर्षो में आरएसएस की कमान संभालने वालों में सुदर्शन अपने बयानों के कारण सबसे विवादास्पद संघ प्रमुख रहे हैं।
सरसंघचालक रहते हुए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना की थी, उन्होंने संविधान के मूल आधार को ही बदलने की बात भी कही थी।
मुसलमानों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर हिन्दू औरतों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की उनकी सलाह भी विवादों में रही।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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