शरीफ सरकार में शामिल हो सकते हैं : गिलानी (लीड-1)
उधर, पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद पर जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की बहाली ने राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की नींद हराम कर दी है।
गिलानी ने समाचार पत्र 'वाल स्ट्रीट जर्नल' को दिए साक्षात्कार में कहा, "हम व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मेरा मुख्य प्रयास टकराव की राजनीति को खात्म करना है।"
गिलानी ने कहा, "मुझे पक्का यकीन है कि लोकतंत्र के हाथ मजबूत करने के लिए मैं शरीफ के साथ काम कर सकता हूं। हमें संसदीय लोकतंत्र की ओर लौटना होगा। मुझे उम्मीद है कि हमारे संबंध फिर से बेहतर हो सकते हैं। मैं उचित समय आने पर शरीफ को गठबंधन में शामिल होने की पेशकश करूंगा।"
पाकिस्तान में वकीलों के आंदोलन की वजह से उपजे अशांत हालात के सुलझाने में अहम भूमिका निभाने वाले गिलानी ने यह बयान ऐसे समय में दिया है जब देश में राजनीतिक समीकरण बदलने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
उधर जरदारी को नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डनेंस (एनआरओ) की समीक्षा का भय सता रहा है जिसे वर्ष 2007 में मुशर्रफ ने लागू किया था। इसके तहत जरदारी व पूर्व प्रधानमंत्री मरहूम बेनजीर भुट्टो को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। इसी कानून के तहत वनवास झेल रहे जरदारी और भुट्टो की वतन वापसी भी हुई थी।
मुशर्रफ को 3 नवम्बर, 2007 को देश में घोषित किए गए आपातकाल के फैसले की समीक्षा का डर सता रहा है।
जाने माने राजनीतिक विश्लेषक आमिर मीर ने 'द न्यूज' में लिखा है कि उपरोक्त कारणों से जरदारी और मुशर्रफ की नींद हराम हो गई होगी। उन्होंने जस्टिस चौधरी के करीबियों के हवाले से लिखा है, "पूरी संभावना है कि मुशर्रफ के फैसलों की समीक्षा की जाएगी।"
उल्लेखनीय है कि 30 जनवरी 2008 को विश्व के नेताओं को लिखे एक खुले पत्र में चौधरी ने कहा था, "मैं संवैधानिक तौर पर पाकिस्तान का प्रधान न्यायाधीश हूं। मैंने पहले ही मुशर्रफ द्वारा 3 नवम्बर 2007 को लिए गए फैसलों को असंवैधानिक करार दिया है।"
उन्होंने कहा था, "निष्पक्ष न्यायपालिका के बगैर लोकतंत्र नहीं रह सकता है और पाकिस्तान में कोई भी न्यायाधीश निष्पक्ष नहीं रह सकता जब तक कि 3 नवम्बर 2007 के फैसले को पलटा नहीं जाता।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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