फ़्रांस फिर से नैटो का सदस्य बनेगा

फ़्रांस की संसद ने राष्ट्रपति निकोलस सरकोज़ी के उस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है जिससे फ़्रांस 40 वर्ष बाद एक बार फिर नैटो कमान का सदस्य बन सकता है. फ़्रांस के राष्ट्रपति के इस प्रस्ताव पर ससंद में बक़ायदा मतविभाजन हुआ और यह प्रस्ताव 91 मतों के अंतर से पारित हो गया.
सरकोज़ी ने पिछले हफ़्ते ही देश की नीति बदलने वाला यह प्रस्ताव रखा था कि फ़्रांस को नैटो में वापस लौटना चाहिए. उनका तर्क था कि फ़्रांस इस संगठन का संस्थापक सदस्य रहा है और वह इस संगठन को सैन्य मदद देने वाला चौथा बड़ा देश है, इसलिए उसे इसके फ़ैसलों में फ़्रांस की भूमिका भी बड़ी होनी चाहिए.
इस क़दम का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इस फ़ैसले से फ़्रांस की स्वतंत्रता पर विपरीत असर पड़ेगा.
'समय की ज़रुरत'
इस संसदीय बहस के परिणाम के बारे में तो कभी भी कोई संदेह नहीं रहा. चूँकि इसे सरकार के लिए एक विश्वास मत के तौर पर देखा गया इसलिए इस वजह से जो विरोधी स्वर थे वे भी अंत में एक साथ आ गए.
हम मानते हैं के नैटो के विस्तार को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि नैटो को कमज़ोर होने से बचाना समय की ज़रूरत है हर्वी मोरीं, रक्षा मंत्री
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प्रधानमंत्री फ्रेंकोइस फिलाँ ने नैटो की सैनिक कमान में फिर से शामिल होने के इस फ़ैसले का महत्व कुछ कम करने की कोशिश की.
उन्होंने कहा कि सरकार के इस क़दम से यह नज़र आता है कि उसकी नीति में कुछ समायोजन किया जा रहा है और इस क़दम को इतिहास से अलग होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि नैटो की गतिविधियों में फ्रांस की पहले से ही भागीदारी रही है.उन्होंने इन आलोचनाओं को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि इस फ़ैसले के बाद फ्रांस अमरीकी हितों के सामने झुक जाएगा.
प्रधानमंत्री ने कहा कि फ्रांस हमेशा ही अमरीका का सहयोगी रहेगा, ना कि उसका कोई अधीन देश.रक्षा मंत्री हर्वी मोरीं ने कहा कि फ्रांस ने नैटो के वैश्विक स्वरूप का हमेशा ही विरोध किया है और चाहा है कि नैटो दरअसल सुरक्षा, स्थिरता और सामूहिक सुरक्षा के गारंटर की भूमिका निभाए. उन्होंने यह भी कहा कि नैटो को अपने विस्तार से पहले रूस के साथ बातचीत अवश्य करनी चाहिए.
अगर वर्ष 2003 में फ्रांस ने इराक़ पर हमले का विरोध करने में अग्रणी भूमिका निभाई होती तो भी क्या फ्रांस को नैटो की पूर्ण सदस्यता हासिल हो जाती? लॉरेंट फ़ैबियस, पूर्व प्रधानमंत्री
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फ्रांस के रक्षा मंत्री हर्वी मोरीं का कहना था, "हम मानते हैं के नैटो के विस्तार को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि नैटो को कमज़ोर होने से बचाना समय की ज़रूरत है."
उनका कहना था, " इस मुद्दे का एक और पहलू है और वो है रूस के साथ संबंधों का. ये ऐसे मामले हैं जिन पर पड़ोसी रूस के साथ बातचीत किए बिना फ़ैसला नहीं लिया जा सकता."
सवाल
लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के एक पूर्व मंत्री ने इस बात पर सवाल उठाया कि इस फ़ैसले के बाद फ्रांस को क्या लाभ मिलेगा.इस फ़ैसले का विरोध करने वालों में चार पूर्व प्रधानमंत्री भी शामिल थे.
उनमें से एक, समाजवादी विचारधारा वाले लारेंट फ़ैबियस ने प्रश्न उठाया कि अगर वर्ष 2003 में फ्रांस ने इराक़ पर हमले का विरोध करने में अग्रणी भूमिका निभाई होती तो भी क्या फ्रांस को नैटो की पूर्ण सदस्यता हासिल हो जाती?
नैटो कमान में फ्रांस की वापसी की आधिकारिक प्रक्रिया नैटो के अगले सम्मेलन में पूरी की जाएगी जिसका आयोजन फ्रांस और जर्मनी संयुक्त रूप से अप्रैल में करने वाले हैं.


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