सरकार बेचारी और क्या करे!

सरकार ने शरीफ़ बंधुओं को लिखित रुप में बताया है कि उनकी जान ख़तरे में है. वकीलों को ख़बरदार किया कि लौंग मार्च के दौरान आत्मघाती हमले और मुंबई की स्टाइल की वारदातें हो सकती हैं. इसलिए वो धरने और लौंग मार्च को नाक की लड़ाई न बनाएँ. देश पर रहम करें और बातचीत की टेबल पर आ जाएं. लेकिन वो नेता ही क्या जो अपनी नाक से आगे देख ले और वकील ही क्या जो सामने वाले की दलील मान ले.
जिस तरह बच्चा आग में कूदने की कोशिश करे तो बाप उसे बचाने के लिए दो चार थप्पड़ जड़कर कमरे में बंद कर देता है. उसी तरह सरकार को भी बाप बनना पड़ता है और नादान जनता को एक बड़े ख़तरे से बचाने के लिए आँसू गैस, लाठी और पिटाई का सहारा लेना पड़ता है.
इसी भावना के तहत सरकार ने कराची से इस्लामाबाद तक पाँच हज़ार कंटेनर सभी मुख्य मार्गों पर कुछ इस तरह से रख दिए कि आम आदमी तो क्या, आतंकवादी भी कंटेंनरों के आर-पार नहीं जा सकते.
आतंकावदियों से सुरक्षा
आतंकवादियों का न तो कोई दीन-ईमान होता है और न ही नैतिकता इसलिए वो इन दिनों किसी भी अहम शख़्सियत या कार्यकर्ता के घर में घुस कर उसे मार सकते हैं इसलिए एहतियात के तौर पर पुलिस उन आतंकवादियों से पहले घरों में कूद गई और बहुत से राजनीतिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल की सुरक्षित कोठरी में पहुंचा दिया ताकि वो आतंकावदियों से सुरक्षित रह सकें.
ये ठीक है कि इस सुरक्षा कार्रवाई के दौरान मानवाधिकार कार्यकर्ता मुसरत हिलाली की टाँग, ताहिरा अब्दुल्लाह का चश्मा और बहुत से राजनीतिक कार्यकर्ताओं और वकीलों के दरवाज़े और सर टूट गए लेकिन जब बच्चे नादान हो जाएं तो माता-पिता को थोड़ी सख़्ती करनी ही पड़ती है.
देश का भविष्य
नौवजान देश और राष्ट्र का भविष्य होते हैं और सरकार आतंकवाद के हाथों भविष्य तबाह होते नहीं देख सकती इसलिए भविष्य को आधी रात को रावलपिंडी और इस्लामाबाद के विश्वविद्यालयों के हॉस्टलों से निकाल कर सड़कों पर खड़ा कर दिया गया ताकि ये नौवजान छात्र-छात्राएं अपनी मर्ज़ी से जहां भी ख़ुद को सुरक्षित समझें, पैदल चले जाएँ.
आतंकवादी होटलों में बम रख सकते हैं और खाने में ज़हर भी मिला सकते हैं इसलिए सरकार को मजबूर होकर होटलों पर पाबंदी लगानी पड़ी कि वो किसी भी संदिग्ध 'लौंगमार्चिए' को कमरा न देंगे और खाने का सामान नहीं बेच सकेंगे.
जो मरीज़ और उनके रिश्तेदार सड़कों की नाकाबंदी की वजह से सरकार को गालियाँ दे रहे हैं उन बेवक़ूफ़ों को ये तक मालूम नहीं कि सरकार की नज़र में चाहे कोई बीमार स्वस्थ हो या मरीज़, सब के सब बराबर के नागिरक हैं.
अगर इन मरीज़ों की एंबुलेंसों को रास्ता नहीं मिल रहा तो उसकी सिर्फ़ एक वजह है कि अतीत में आतकंवादी कई बार एंबुलेंस को हाईजैक करके उन्हें हथियार और गोला बारूद उधर से इधर ले जाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. और कोई भी सरकार एक मरीज़ की जान की क़ीमत पर बीसियों बेगुनाह लोगों की जान ख़तरे में नहीं डाल सकती.
उन क़दमों के नतीजे में आतंकवादियों के हाथ पाँव बाँध दिए गए हैं और वो अब सिर्फ़ पेशावर में नेटो के अठारह ट्रक कंटेनरों को तबाह करके कुछ नहीं कर सके.
इन कोशिशों में न सिर्फ़ प्रशासन बल्कि राष्ट्रपति ज़रदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी की कैबिनेट का पूरा समर्थन प्राप्त है.
रहे सूचना प्रसारण मंत्री शेरी रहमान जैसे लोग, तो उनके इस्तीफ़े और विरोध का कोई ख़ास महत्व नहीं है. ऐसे एक दो भावनात्मक लोग कहाँ नहीं पाए जाते हैं!


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