तीन दशक बाद हुआ अंतिम संस्कार

तीन दशक बाद हुआ अंतिम संस्कार

मोहम्मद दाऊद ख़ान को 1978 के तख़्तापटल के बाद मार डाला गया था और उनकी लाश एक सामूहिक कब्र में दबा दी गई थी.

मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में हुए एक समारोह में पूर्व राष्ट्रपति को श्रद्धांजलि देने राजनीतिक नेताओं समेत अनेक समर्थक पहुँचे थे. पूर्व राष्ट्रपति के सम्मान में मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान का झंडा आधा झुका रहा.

उनके अवशेषों को दफ़नाए जाने के समय अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई भी मौजूद थे.

दाऊद ख़ान ने 1973 में राजा ज़ाहिर शाह को हटाकर सत्ता अपने कब्ज़े में ले ली थी.

तीन दशक बाद आयोजित इस अंतिम संस्कार समारोह में शामिल लोग दाउद ख़ान की तस्वीर लिए हुए थे, उन्होंने हवाई फ़ायर किए और राष्ट्रगान बजाया.

वामपंथी विद्रोहियों के तख़्तापलट में दाऊद ख़ान के मारे जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत सेना ने धावा बोल दिया और सोवियत सेना के हटने के बाद वहाँ तालेबान का शासन क़ायम हो गया.

अवशेषों की पहचान

पिछले वर्ष अफ़ग़ान सरकार की एक समिति ने सेना के एक अड्डे पर खुदाई के दौरान दाउद ख़ान के अवशेषों को निकाला था.

काबुल के नज़दीक स्थित पुल-ए-कचहरी की दो बड़ी सामूहिक कब्रों के पास दाऊद ख़ान के अवशेषों की पहचान की गई थी.

दर्ज़नों लाशों के बीच अपने परिवार के 16 सदस्यों के साथ दाऊद ख़ान की लाश भी मिली थी.

कुरआन की यह प्रति दाऊद ख़ान को सऊदी अरब के शाह ने तोहफ़े में दी थी जब वे रियाद के दौरे पर गए थे प्रवक्ता का बयान

कुरआन की यह प्रति दाऊद ख़ान को सऊदी अरब के शाह ने तोहफ़े में दी थी जब वे रियाद के दौरे पर गए थे

अधिकारियों ने बताया था कि दाँतों के रिकॉर्ड के आधार पर उनकी पहचान की गई, साथ ही विशेषज्ञों को उनकी लाश के साथ सोने की ज़िल्द वाली कुरआन की प्रति भी मिली.

प्रवक्ता ने बताया, "कुरआन की यह प्रति दाऊद ख़ान को सऊदी अरब के शाह ने तोहफ़े में दी थी जब वे रियाद के दौरे पर गए थे."

अफ़ग़ानिस्तान में दाऊद ख़ान की हत्या को बहुत सारे लोग एक काले अध्याय की शुरूआत के तौर पर देखते हैं. उनकी हत्या के बाद एक दशक तक देश पर सोवियत सेना का नियंत्रण रहा और गृहयुद्ध चलता रहा. जिसके बाद तालेबान सत्ता में आ गए जिन्हें अमरीका ने 2001 में सत्ता से हटा दिया लेकिन आज तक संघर्ष जारी है.

दाऊद ख़ान के पाँच वर्षों के कार्यकाल को सुधार के दौर के रूप में देखा जाता है, उन्होंने इस्लामी नेताओं के प्रभाव को कम करके अफ़ग़ानिस्तान को एक गणराज्य बनाने की कोशिश की.

उन्होंने सोवियत संघ के मुक़ाबले पश्चिमी देशों से दोस्ती पर अधिक बल दिया था.

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