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मध्य प्रदेश सरकार ने माना, आधा प्रदेश प्यासा

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मध्य प्रदेश विधानसभा के दूसरे सत्र के दूसरे दिन नियम 139 के अधीन लोक महत्व के विषय के तहत पेयजल संकट पर लगभग साढ़े तीन घंटे चर्चा चली। इस चर्चा में 37 विधायकों ने हिस्सा लिया और बिगड़ते हालात पर चिंता जताई। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा सत्ता पक्ष और भारतीय जन शक्ति पार्टी, बहुजन समाज पार्टी तथा निर्दलीय सदस्यों ने प्रदेश में गहराए जल संकट के निदान के लिए कारगर पहल करने पर जोर दिया।

प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर ने बताया कि प्रदेश के 158 नगरीय निकाय, जिनमें नगर पंचायत व नगर पालिकाएं शामिल हैं, पेयजल संकट से जूझ रहे हैं वहीं 180 नगरीय निकाय ऐसे हैं जहां लोगों को पानी मिल रहा है। उन्होंने बताया कि इंदौर, उज्जैन और भोपाल संभाग में वर्षा पर्याप्त न होने के कारण पानी का संकट गहराया है। सरकार इससे निपटने के कारगर इंतजाम कर रही है और आम आदमी को पानी उपलब्ध कराने में धन राशि कहीं भी बाधक नहीं बनेगी।

प्रदेश के संसदीय कार्य मंत्री और प्रभारी लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने माना कि प्रदेश में पेयजल संकट है और इससे निपटने के लिए सरकार पूरी तरह तैयार है। उन्होंने बताया कि प्रदेश के 50 में से 34 जिले ऐसे हैं जहां 20 प्रतिशत से कम वर्षा हुई है, इसके बावजूद पेयजल संकट से निपटने के प्रयास जारी हैं।

उन्होंने सदस्यों से एक प्रस्ताव पारित करने के लिए समर्थन चाहा जो चुनाव आयोग को भेजा जाए जिसमें उल्लेख हो कि पेयजल योजनाओं को आचार संहिता की परिधि से बाहर रखा जाए। इस पर अधिकांश सदस्यों ने सहमति भी जताई।

चर्चा में हिस्सा लेने वाले विधायकों का कहना था कि जल स्रोत सूख चुके हैं, हैन्डपम्प लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की लापरवाही के कारण आम आदमी की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। पेयजल परिवहन के लिए योजनाए लंबित पड़ी हैं, वहीं नल जल योजनाएं जिनके संचालन की जिम्मेदारी पंचायतों पर है, वे ठप पड़ी हैं।

कांग्रेस के गोविन्द सिंह ने कहा कि पिछले नौ साल में पानी संरक्षण पर साढ़े नौ हजार करोड़ से अधिक रुपए खर्च किए गए हैं मगर आम आदमी की समस्याएं और बढ़ती जा रही है। तालाब निर्माण, पानी रोकने की संरचना और नल कूप पर विशेष ध्यान दिए जाने के बावजूद हर तरफ सूखा नजर आ रहा है।

राकेश सिंह चौधरी ने नर्मदा सहित अन्य प्रमुख नदियों के पानी का पर्याप्त इस्तेमाल न किए जाने पर चिंता जताई। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रदेश में भवन निर्माणों का काम जोरों पर है मगर इन निर्माताओं को वाटर हार्वेस्टिंग के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा है।

विपक्ष के उपनेता सज्जन सिंह वर्मा ने पानी परिवहन के लिए सार्थक पहल न किए जाने पर चिंता जताई। नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने सुझाव दिया कि सरकार इस दिशा में प्रयास करे कि चुनाव आचार संहिता से पेय जल संकट के निराकरण की कोशिश अप्रभावी रहे। यादवेन्द्र सिंह ने भी पेयजल संकट की स्थिति पर चिन्ता जताई।

भाजपा के विश्वास सारंग ने प्रदेश की राजधानी भोपाल में गहराए जल संकट को कृत्रिम करार दिया और कहा कि कांग्रेस की नगर निगम पानी की उपलब्धता के बावजूद आम आदमी को उपलब्ध नहीं करा रही है। निर्दलीय विधायक पारस सखलेचा ने इस बात पर सख्त आपत्ति जताई कि प्रमुख शहरों की समस्या की चिंता तो हर किसी को है मगर छोटे शहरों की समस्या पर किसी को चिंता नहीं है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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