मसखरे या गपोड़ी ही नहीं थे शेख़ चिल्ली

मसखरे या गपोड़ी ही नहीं थे शेख़ चिल्ली

वे मुग़ल शहज़ादे और विद्वान दारा शिकोह के उस्ताद थे. माना जाता है कि दारा शिकोह ने अपने उस्ताद के जीवित रहते ही उनका मक़बरा बनवा दिया था.

हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेसर इलाक़े में शेख़ चिल्ली का मक़बरा आज भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

शेख़ चिल्ली का नाम सुनते ही एक गपोड़ी और मसखरे व्यक्ति की शख्सियत हमारे मन में उभरती है, उनके ढेर सारे क़िस्से मशहूर हैं.

ताजमहल की तरह

शेख़ चिल्ली की असली कहानी कुछ और ही है. कुरुक्षेत्र शहर के थानेसर इलाक़े में एक निहायत ही ख़ूबसूरत मक़बरा है, जिस पर लिखा है ''शेख़ चिल्ली का मक़बरा'' उसे देख कर हर कोई चौंक जाता है. एक गपोड़ी के नाम पर इतना शानदार मक़बरा?...

मक़बरे की मुख्य इमारत ताज महल की तरह संगमरमर से बनी है. ताज महल की ही तरह बड़ा सा गुंबद ऊपर और शेख़ चिल्ली की क़ब्र नीचे तह-ख़ाने में...वहां कुल छह क़ब्रें हैं, ज़ाहिर है एक शेख़ चिल्ली की और बाकी नामालूम लोगों कीं.

मुख्यद्वार पर लगे सरकारी पटल के अनुसार शेख़ चिल्ली का नाम अब्दुल रहीम अब्दुल करीम था और वह मुग़ल शहज़ादे दारा शिकोह के उस्तादों में से थे.

कहा जाता है की दारा शिकोह महीनों यहाँ आकर रहते थे और अपने उस्ताद से सूफ़ी मत की तालीम हासिल करते थे.

दारा शिकोह के उस्तादों में सबसे बड़ा नाम था मीर मियां मुल्ला बदकशी, जो कश्मीर के रहने वाले थे. उनके दूसरे उस्ताद शेख़ जलालउद्दीन थानेसरी थे.

बनारस निवासी बाबा लाल बैरागी भी उनके ख़ास उस्तादों में से थे. जिनसे दारा शिकोह ने हिंदू धर्मशास्त्र और संस्कृत की शिक्षा ली थी.

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि दरअसल शेख़ जलाल उद्दीन और अब्दुल करीम अब्दुल रहीम एक ही व्यक्ति के नाम हैं.

विवाद

भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़ दारा शिकोह (सन 1615-1659) ने यह मक़बरा वर्ष 1640 में बनवाया था, लेकिन इतिहासकारों में इसको लेकर विवाद है.

मक़बरे की बाहरी दीवारों पर बारह छतरियां और नौ मेहराबें बनी हैं

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये मक़बरा शेरशाह सूरी (1472-1545) के ज़माने में बनाया गया था. इतिहास में इस मक़बरे का संबंध फिरोज़ शाह तुग़लक़ (1309-1388) से भी जोड़ा गया है.

शेख़ चिल्ली का संबंध सूफ़ियों की "चिश्ती" परंपरा से था.

मक़बरे के चारों तरफ ख़ूबसूरत बाग़ हैं, लॉन पूरा हरा भरा है, बाहरी दीवारों पर बारह छतरियां और नौ मेहराबें बनी हैं, क़रीब ही पुराना तालाब है जो अब सूखा है, लेकिन उसे देखकर लगता है पानी लाने के लिए यहाँ नहरें भी बनाई गईं थीं.

मकबरे से थोड़ा हटकर ख़ूबसूरत "पत्थर मस्जिद" भी बनी हुई है.

यह भी माना जाता है कि शेख़ चिल्ली ने सबसे पहले मुग़ल शासन की समाप्ति की भविष्यवाणी की थी और उन्होंने दारा शिकोह को सलाह दी थी कि जो भी काम करने हैं अपने जीवन में कर लो.

इसीलिए दारा शिकोह ने अपने उस्ताद के जीवित रहते ही उनके इस मक़बरे का निर्माणकरवा दिया था.

हरियाणा सरकार और कुरूक्षेत्र के स्थानीय प्रशासन ने इस स्थान को साफ़ सुथरा और जीवंत बना रखा है और यहाँ आज भी पर्यटकों का तांता लगा रहता है.

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