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लिज्जत ने पूरे किए 50 साल

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lijjat papad

पचास साल पहले छह अन्य महिलाओं के साथ लिज्जत पापड़ की शुरुआत करने वाली जसवंतबेन पोपट याद करती है उन शुरुआती दिनों को....शरीर ज़रूर बूढ़ा नज़र आता है दिमाग ख़ासा सतर्क दिखाई देता है. वे नौजवानों वाले जोश से कहती हैं, "मैं काम करना जारी रखना चाहती हूँ, जब तक जिंदा हूँ..."

उन सात गुजराती महिलाओं में से केवल पोपट ही जीवित हैं जिन्होंने 50 साल पहले पापड़ बनाने की कोऑपरेटिव लिज्जत की स्थापना की थी.

मुझे लगता है की मैं एक सपना देख रही हूँ. जब हम लोगों ने अपना काम शुरू किया था तब नहीं मालूम था की यह इतना फैल जायेगा. समाज सेवक पारेख ने हमें सलाह दी थी की अगर हमें सफल होना है तो हम किसी के आगे हाथ न फैलाएँ. हमने यह सलाह हमेशा याद रखी पोपट, लिज्जत शुरु करने वाली सात महिलाओं में से एक

मुझे लगता है की मैं एक सपना देख रही हूँ. जब हम लोगों ने अपना काम शुरू किया था तब नहीं मालूम था की यह इतना फैल जायेगा. समाज सेवक पारेख ने हमें सलाह दी थी की अगर हमें सफल होना है तो हम किसी के आगे हाथ न फैलाएँ. हमने यह सलाह हमेशा याद रखी

पंद्रह मार्च को लिज्जत पापड़ की 50वीं वर्षगांठ है और अब वे 45 हज़ार अन्य महिलाओं के साथ जश्न मनाने में जुटी हुई हैं जो इस कोऑपरेटिव की सदस्य हैं.

पोपट एक लंबा सांस लेकर बड़े संतोष से कहती हैं, "मुझे लगता है की मैं एक सपना देख रही हूँ. जब हम लोगों ने अपना काम शुरू किया था तब नहीं मालूम था की यह इतना फैल जायेगा."

'शुरुआत 80 रुपए से'

इसमें कोई शक़ नहीं की 450 करोड़ रुपए सालाना वाला पापड़ का धंधा भारत में एक पहचाना जाने वाला ब्रांड बन गया है. ये और सराहनीय इसलिए है क्योंकि ये महिलाएँ गर्व से बताती हैं कि उन्होंने केवल 80 रुपए के निवेश से ये कारोबार शुरु किया था.

ये कहानी तब शुरु हुई जब मुंबई की झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाली, बहुत ही कम पढ़ी-लिखी सात गुजराती महिलाओं ने अपने परिवार की कमाई में इज़ाफ़ा करने की एक तरकीब सोची. आज लिज्जत के लिए 45 हज़ार महिलाएँ काम करती हैं

आपस में चर्चा के दौरान उन्होंने कहा - "हमें एक ही हुनर मालूम है और वह है खाना पकाना... क्यों नहीं हम इस का सही उपयोग कर कुछ पैसे कमाएँ?"

तब जन्म हुआ लिज्जत पापड़ का.....15 मार्च 1959 को एक ईमारत की छत पर इन सातों औरतों ने लिज्जत पापड़ के चार पैकेट तैयार किए सिर्फ़ 80 रुपए की लागत से और ये पूँजी भी उन्होंने एक समाज सेवक छगनलाल करमसी पारेख से क़र्ज़ ली थी.

'क़ामयाबी स्वाद और गुणवत्ता से'

पोपट लिज्जत पापड़ की कामयाबी में पारेख का बड़ा हाथ बताती हैं. वे कहती है, "उन्होंने हमें सलाह दी की अगर हमें सफल होना है तो हम किसी के आगे हाथ न फैलाएँ. हमने यह सलाह हमेशा याद रखी."

जल्द ही यह व्यापार फलने-फूलने लगा. तीन महीने बाद 25 और महिलाओं ने इस व्यापार को अपना लिया. कुछ सालों बाद लिज्जत पापड़ की शोहरत तेज़ी से फैलने लगी और देखते ही देखते मुंबई में इसकी कई शाखाएँ खुल गईं.

लिज्जत एक ठोस और टिकाऊ व्यापार का बेहतरीन उदहारण है. बड़ी संख्या में कम पढ़ी-लिखी पर हुनरमंद औरतों ने अपने हुनर को एक संगठनात्मक रूप दिया है और जब ऐसा होता है तो टिकाऊ व्यापार खड़ा हो जाता है कारोबारी मामलों के जानकार ज्वारिज्का

लिज्जत एक ठोस और टिकाऊ व्यापार का बेहतरीन उदहारण है. बड़ी संख्या में कम पढ़ी-लिखी पर हुनरमंद औरतों ने अपने हुनर को एक संगठनात्मक रूप दिया है और जब ऐसा होता है तो टिकाऊ व्यापार खड़ा हो जाता है

इस पापड़ का निर्यात भी होने लगा. इन महिलाओं ने पापड़ के अलावा साबुन, चटनी और अचार भी बनाना शुरू कर दिया.

हमनें जसवंतबेन पोपट से पूछा कि लिज्जत पापड़ की सफलता के मुख्य कारण क्या हैं? उनका कहना था, "कामयाबी का मुख्य कारण इसका स्वाद और क्वालिटी यानी गुणवत्ता हैं."

मुंबई के एक बड़े व्यापारी और आर्थिक मामलों के जानकार सुशील ज्वारिज्का इनकी सफलता पर कुछ इस तरह की टिपण्णी करते हैं -"लिज्जत एक ठोस और टिकाऊ व्यापार का बेहतरीन उदहारण है. बड़ी संख्या में कम पढ़ी-लिखी पर हुनरमंद औरतों ने अपने हुनर को एक संगठनात्मक रूप दिया है और जब ऐसा होता है तो टिकाऊ व्यापार खड़ा हो जाता है."

आर्थिक सुरक्षा की कुंजी

महिलाओं की आर्थिक मुक्ति का एहसास भी छोटे व्यापार को एक बड़ा और कामयाब व्यापार बनाने में महत्त्वपूर्ण किरदार निभाता हैं ज्योति नायक, लिज्जत से 40 साल से जुड़ी

महिलाओं की आर्थिक मुक्ति का एहसास भी छोटे व्यापार को एक बड़ा और कामयाब व्यापार बनाने में महत्त्वपूर्ण किरदार निभाता हैं

ज्योति नायक लिज्जत पापड़ से चालीस साल से जुड़ी हैं. वे कहती हैं, "महिलाओं की आर्थिक मुक्ति का एहसास भी छोटे व्यापार को एक बड़ा और कामयाब व्यापार बनाने में महत्त्वपूर्ण किरदार निभाता हैं."

प्रियंका रेडकर 35 वर्ष की हैं और उन्होंने नौ साल पहले पापड़ बनाना शुरू किया था. आज उनके पास इतने पैसे हैं कि वे अपने दो बच्चों की पढाई और दूसरी जरूरतें पूरी कर सकती हैं. वे कहती हैं, "आज मुझे अपने पति के आगे पैसों के लिए हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं है."

रंजना खंडारे ने लिज्जत परिवार में ही आँखे खोलीं थीं. उन्होंने भी नन्ही उम्र से ही पापड़ बेलने में आपनी माँ का हाथ बटाना शुरू कर दिया था. वे बताती है, "मैंने जीवन भर यहीं काम किया हैं. मुझे कुछ और काम नहीं आता. लेकिन इस काम ने मुझे आर्थिक निर्भरता दी है."

इस आर्थिक आज़ादी का मतलब 'महिला शक्ति' लगाया जाता हैं. लिज्जत पापड़ से जुडी 45 हज़ार महिलाओं में से अधिकतर अब भी झुग्गी-झोंपड़ी या चौल में रहती हैं. वे आज भी रोज़ाना मज़दूरी करती हैं लेकिन इस संस्था से सालों साल तक जुड़े रहने के कारण उन्हें जो आर्थिक सुरक्षा मिलती हैं वो भारत में करोडों अन्य महिलाओं को नसीब नहीं है.

लिज्जत के कारोबार में जुटी महिलाओं ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि व्यापारिक सफलता के लिए बड़ी धन-राशि और कारखानों की ज़रुरत नहीं है.

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