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'सपा से गठबंधन की संभावना बरक़रार'

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abhishek singhvi

कांग्रेस का कहना है कि चुनाव से पहले यूपीए की सभी सहयोगी पार्टियों से राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ संभव नहीं और सपा से गठजोड़ की संभावनाएँ ख़त्म नहीं हुई.

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर कहा, "आप जो आपसी स्टैटिक सुनते हैं, उस पर नहीं जाएँ. आवाज़ पर नहीं जाएँ. चुनाव के पहले जब टिकट वितरण होता है उस समय ये स्वाभाविक होता है कि कुछ हद तक माँगें बढ़ती हैं, आवाज़ें बढ़ती हैं, स्टैटिक बढ़ता है. उस पर गठबंधन निर्भर नहीं होते. अभी नामांकन पत्र भरने की आख़िरी तारीख़ में समय है. उससे पहले कुछ भी हो सकता है."

सपा से चुनाव पूर्व गठबंधन में आ रही रुकावटों के बारे में उन्होंने कहा, "हमको एक न्यूनतम संख्या चाहिए. क्योंकि उससे कम पर हम नहीं मानेंगे."

अभिषेक मनु सिंघवी से बातचीत

क्या ये न्यूनतम संख्या 24 है, ये पूछे जाने पर कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. सिंघवी ने कहा, "वो न्यूनतम संख्या क्या है, ये हम औपचारिक रूप से नहीं कह सकते. उस पर बातचीत की गुंज़ाइश होती है. लेकिन जहाँ मान-सम्मान के साथ वो न्यूनतम संख्या होगी और दोनों हाथों से ताली बजेगी, तो आप निश्चिंत रहें कि कुछ-न-कुछ हल निकलेगा."

उन्होंने कहा कि अंत आने तक मामला ख़त्म नहीं समझना चाहिए, लेकिन अंत तक भी कोई हल नहीं निकला तो कांग्रेस पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है.

गठबंधनों के ख़िलाफ़ नहीं

डॉ. सिंघवी ने कहा कि ये धारणा बिल्कुल ग़लत है कि कांग्रेस गठबंधनों के विरुद्ध है. अपनी बात के समर्थन में उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व में पाँच साल तक चले स्वतंत्रता बाद के सबसे बड़े गठबंधन यूपीए का उल्लेख किया.

सबसे गठजोड़ नहीं आप देखें तो हमारा गठबंधन ज़्यादा माकूल, ज़्यादा अखिल भारतीय है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम हर उस पार्टी से गठबंधन करें जो हमारे साथ केंद्र में है. अगर कोई पार्टी चाहती है कि हम उसे किसी अन्य प्रदेश में सीटें दें जहाँ उसका अस्तित्व नहीं है, तो चुनाव से पहले इस तरह का अखिल भारतीय गठबंधन संभव नहीं होता. अभिषेक मनु सिंघवी

आप देखें तो हमारा गठबंधन ज़्यादा माकूल, ज़्यादा अखिल भारतीय है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम हर उस पार्टी से गठबंधन करें जो हमारे साथ केंद्र में है. अगर कोई पार्टी चाहती है कि हम उसे किसी अन्य प्रदेश में सीटें दें जहाँ उसका अस्तित्व नहीं है, तो चुनाव से पहले इस तरह का अखिल भारतीय गठबंधन संभव नहीं होता.

गठबंधन की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस से पीछे बताते हुए डॉ. सिंघवी ने कहा, "भाजपा दो वर्षों से तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन का प्रयास कर रही थी जिसमें उसे सफलता नहीं मिली. तृणमूल के साथ उनका गठबंधन टूट गया. आंध्रप्रदेश में उनकी पुराने सहयोगी तेदेपा से नहीं बन रही है. और उड़ीसा में आपने देखा कि उनका चलता हुआ गठबंधन टूट गया."

उन्होंने आगे कहा, "आप देखें तो हमारा गठबंधन ज़्यादा माकूल, ज़्यादा अखिल भारतीय है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम हर उस पार्टी से गठबंधन करें जो हमारे साथ केंद्र में है. अगर कोई पार्टी चाहती है कि हम उसे किसी अन्य प्रदेश में सीटें दें जहाँ उसका अस्तित्व नहीं है, तो चुनाव से पहले इस तरह का अखिल भारतीय गठबंधन संभव नहीं होता."

उपलब्धियाँ

पाँच साल सत्ता में रही पार्टी के रूप में कांग्रेस मतदाताओं के पास वायदों के अलावा उपलब्धियों की सूची लेकर भी जाएगी, तो क्या तीन प्रमुख उपलब्धियाँ गिनाएगी पार्टी, इसके जवाब में डॉ. सिंघवी ने कहा, "उपलब्धियाँ तो बहुत ज़्यादा हैं. लेकिन आपने तीन गिनाने को कहा है तो पहली उपलब्धि है- एक स्थिर सफल सरकार चलाना जिसका आधार रहा है सब को बिना विभाजित किए साथ लेकर चलना. नंबर दो- आर्थिक क्षेत्र में ऐसी अदभुत योजनाएँ चलाना जो पिछले 60 साल में नहीं चलाई गई थीं. जैसे- राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना, शहरी मिशन, स्वास्थ्य बीमा योजना आदि. और तीसरा- ऐसे क़ानून पास करना जो सामाजिक सोच में क्रांति लाए. जैसे- सूचना का अधिकार, घरेलू हिंसा क़ानून और विशेष आर्थिक क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण के संबंध में पुनर्वास क़ानून."

तीसरा मोर्चा वास्तविक विकल्प नहीं जब अस्थिरता तीसरे मोर्चे की एक परिभाषा बन जाए तो कुछ महीनों के लिए कोई ऐसा अवसरवादी आडंबर से प्रेरित गठबंधन जन्म लेता भी है तो मुझे नहीं लगता देशवासी उसे लाज़िमी मानेंगे और किसी प्रकार से वो चल पाएगा, या कभी कोई वास्तविक विकल्प बन सकेगा. अभिषेक मनु सिंघवी

जब अस्थिरता तीसरे मोर्चे की एक परिभाषा बन जाए तो कुछ महीनों के लिए कोई ऐसा अवसरवादी आडंबर से प्रेरित गठबंधन जन्म लेता भी है तो मुझे नहीं लगता देशवासी उसे लाज़िमी मानेंगे और किसी प्रकार से वो चल पाएगा, या कभी कोई वास्तविक विकल्प बन सकेगा.

उड़ीसा में भाजपा-बीजेडी का गठबंधन टूटने के बाद एक तीसरे मोर्चे की बढ़ी संभावनाओं को नकारते हुए कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, "तीसरे मोर्चे की बात हम कम-से-कम 20 वर्षों से सुन रहे हैं. आप इसका राजनीतिक इतिहास देखें. कभी ये सफल रहा है, कभी ये वास्तविक विकल्प बन पाया है या सिर्फ़ निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का तरीक़ा रहा है?"

उन्होंने कहा, "जब अस्थिरता तीसरे मोर्चे की एक परिभाषा बन जाए तो कुछ महीनों के लिए कोई ऐसा अवसरवादी आडंबर से प्रेरित गठबंधन जन्म लेता भी है तो मुझे नहीं लगता देशवासी उसे लाज़िमी मानेंगे और किसी प्रकार से वो चल पाएगा, या कभी कोई वास्तविक विकल्प बन सकेगा. इसलिए हमेशा ऐसी पार्टियाँ एक ध्रुव के इर्दगिर्द घूमेंगी और वो ध्रुव सिर्फ़ कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए ही हो सकता है."

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