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'पार्ट टाइम नौकरी से काम चला रहा हूँ'

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'पार्ट टाइम नौकरी से काम चला रहा हूँ'

ये बात जनवरी की है. मैं बेरोज़गार था और दाना-पानी की व्यवस्था करनी थी. यहाँ मैं ये भी बता दूँ कि मेरे साथ कई और दोस्त कंपनी से निकाले गए थे.

उन लोगों पर भी उसी तरह के आरोप लगाए गए, जो मेरे ऊपर लगाए गए थे.

नौकरी जाने की पीड़ा क्या होती है, इसे मैं क्या बताऊँ? ये समझने की चीज़ है. क्या हालत होगी अगर आपको अचानक नौकरी से निकाल दिया जाए?

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भविष्य के सपने लगे अचानक टूट गए हों. मैं नौकरी मिलने के बाद घर में भी कुछ पैसे देता था. हालाँकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी क्योंकि मेरे पापा अभी भी लखनऊ में वकालत कर रहे हैं.

ये बड़ा ही विचित्र समय था क्योंकि नौकरी करते हुए हमें मिलने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी. लेकिन अब वही पुराने दोस्त एक साथ मिल कर चाय पीत और चर्चा करते.

ये बड़ा ही विचित्र समय था क्योंकि नौकरी करते हुए हमें मिलने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी. लेकिन अब वही पुराने दोस्त एक साथ मिल कर चाय पीत और चर्चा करते.

मेरी शादी भी नहीं हुई है. इसलिए परिवार को लेकर चिंताएँ नहीं थी. लेकिन ये भी सच है कि मेरी नौकरी के बूते अम्मी-पापा ने भी कुछ योजनाएँ बनाई थीं.

अब उन्हें बताना था कि मेरी नौकरी नहीं रही. मुझे याद है कि मैंने फ़ोन किया लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहा था. घर में लोगों को लगा कि तबीयत वगैरह ख़राब हो गई है, लेकिन हिम्मत बटोर मैंने सच्चाई बताई.

दोस्तों का साथ

इस मुश्किल दौर में मुझे मेरे दोस्तों का साथ मिला. ये बहुत महत्वपूर्ण होता है कि संकट के समय आपकी भावनाएँ समझने वाले हों जिनके सामने आप खुल कर हँस सकें या रो सकें.

मैं यही सोच कर तसल्ली करने की कोशिश कर रहा था कि जो मेरे साथ हुआ, वही औरों के साथ भी हुआ है.

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मेरे कई और दोस्त जो अन्य कंपनियों में या बड़े-बड़े बिल्डरों के साथ काम कर रहे थे, उन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया था.

ये बड़ा ही विचित्र समय था क्योंकि नौकरी करते हुए हमें मिलने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी. लेकिन अब वही पुराने दोस्त एक साथ मिल कर चाय पीते और चर्चा करते.

ये सिलसिला लगभग एक पखवाड़े तक चलता रहा. हम बारी-बारी से हर दिन किसी दोस्त के घर पहुँच जाते. बैठकी में नौकरी जाने का रोना तो होता ही लेकिन हँसी मज़ाक भी होती.

साथ-साथ फ़िल्म देखते और इसी बीच नौकरी तलाशने की कोशिश भी. हमारी चर्चाएँ रियल एस्टेट सेक्टर पर जम कर होती.

हम लोग चर्चा करते कि किस तरह बिल्डरों ने कुछ ही साल में कृत्रिम तौर पर मकानों के दाम दस गुना तक बढ़ा दिए लेकिन अब जब अर्थव्यवस्था संकट में है, तो वो मुनाफ़ा कमाने की आदत को छोड़ नहीं रहे.

हमें अब भी लगता है कि अगर फ्लैटों के दाम घटाएँ जाएँ तो इस सेक्टर में चहल-पहल शुरु हो जाएगी और ख़रीदार भी आएंगे. इसमें बिल्डरों को घाटा भी नहीं होगा.

रोज़ी-रोटी का जुगाड़

कुछ पैसे बनाने के लिए मैंने दोस्तों के साथ मिल कर एक वेबसाइट बनाई जो ठीक-ठाक चल रही है.

निजी तौर पर मेरे डिज़ाइन कई जगह पसंद किए गए. इसी बीच नौकरी कर रहे मेरे कॉलेज के पुराने छात्रों ने मुझे मदद की.

हमें अब भी लगता है कि अगर फ्लैटों के दाम घटाएँ जाएँ तो इस सेक्टर में चहल-पहल शुरु हो जाएगी और ख़रीदार भी आएंगे. इसमें बिल्डरों को घाटा भी नहीं होगा.

हमें अब भी लगता है कि अगर फ्लैटों के दाम घटाएँ जाएँ तो इस सेक्टर में चहल-पहल शुरु हो जाएगी और ख़रीदार भी आएंगे. इसमें बिल्डरों को घाटा भी नहीं होगा.

उन्हीं की मदद से मेरी ही डिज़ाइन पर एक बिल्डिंग बन रही है. आजकल मैं पार्ट टाइम में उसी बिल्डिंग का काम देख रहा हूँ.

इससे कुछ पैसे मिल जाते हैं लेकिन नौकरी वाली बात नहीं रही. साथ ही ये भी टेंशन रहता है कि आगे क्या होगा?

सच कहिए तो मेरी मनोदशा ऐसी नहीं है और ना ही इतना पैसा है कि ख़ुद बिल्डर बना जाऊँ. आदत ही ऐसी हो गई है कि कहीं नौकरी मिल जाए, और वहाँ महीने का वेतन मिलता रहे.

लाइफ़ में ज़्यादा टेंशन लेने वालों में मै नहीं हूँ. बल्कि आप कह सकते हैं कि जोख़िम लेने से मैं घबराता हूँ.

ख़ैर फिलहाल रोटी-रोज़ी का जुगाड़ तो हो गया है और इसी विश्वास से भविष्य देख रहा हूँ कि आने वाले कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौट आएगी.

(फ़राज़ ख़ान की आपबीती बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित थी. हम जल्द ही मंदी का सामना कर रहे एक और शख़्स की आपबीती आप तक पहुँचाएँगे?)

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