'इराक़ी महिलाओं को पानी तक नसीब नहीं'

इराक़ पर अमरीकी हमले के छह वर्षों बाद इराक़ में हिंसा में कमी तो आई है लेकिन महिलाओं को बुनियादी सुविधाएँ और सुरक्षा अभी भी मयस्सर नहीं है.सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम ने एक सर्वेक्षण के आधार पर ये निष्कर्ष निकाला है.
इसके तहत इराक़ के पाँच प्रांतों में पिछले साल लगभग 1700 महिलाओं पर सर्वेक्षण किया गया. ऑक्सफ़ैम ने इराक़ के मौजूदा हालात को 'मौन आपातकाल" बताया.
ज़्यादातर विधवाएं महसूस करती हैं कि यही अल्लाह की मर्ज़ी है और उन्हें अपने परिवार की बात माननी ही होगी हाना अदवर
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रिपोर्ट का कहना है कि आधी से भी ज़्यादा महिलाएँ हिंसा की शिकार हो चुकी हैं. एक चौथाई महिलाओं को पानी नसीब नहीं होता और तीन चौथाई से ज़्यादा ज़रुरतमंद महिलाओं को पेंशन नहीं मिलती है.
पिछले महीने इराक़ के महिला विकास मंत्री ने यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि सरकार महिलाओं की स्थिति पर गंभीर नहीं है.
ऑक्सफ़ैम का कहना है, "इराक़ी महिलाएँ मौन आपातकाल झेल रही हैं. वे देश में समग्र रूप से हिंसा की कमी होने के बावजूद गरीबी, निजी सुरक्षा और निराशा के भंवर में फंसी हुई हैं."
घरेलू हिंसा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जारी यह सर्वेक्षण बताता है कि इराक़ में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा विधवाएं घरेलू हिंसा की शिकार बनती हैं.
ज़्यादातर विधवाएं महसूस करती हैं कि यही अल्लाह की मर्ज़ी है और उन्हें अपने परिवार की बात माननी ही होगी महिला अधिकार अभियानकर्ता हाना अदवर
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सर्वेक्षण में भाग लेने वाली एक तिहाई महिलाओं ने कहा कि उनके परिवार के सदस्य हिंसा में मारे गए.
हालांकि देश में 2008 में सुरक्षा व्यवस्था सुधरी है लेकिन ज़्यादातर महिलाओं का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी चिंता निजी सुरक्षा की है.
क़रीब आधी महिलाओं ने कहा कि 2008 में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति इससे पहले के दो सालों के मुक़ाबले बदतर थी. जवाब देने वाली आधी महिलाओं ने कहा कि वह ग़रीब होती जा रही हैं.
एक विधवा नादिया हुसैन ने बीबीसी से कहा कि उनके पति के मारे जाने के बाद उन्हें घर संभालने का काम तो मिल गया लेकिन वह व्यक्ति उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने की कोशिश करता रहा. इसके अलावा उनका भतीजा उन्हें रोज़ पीटता है.
महिला अधिकारों की अभियानकर्ता हाना अदवर ने कहा है कि विधवाओं को यह समझाना सबसे मुश्किल काम है कि वे कहीं अधिकारों की हक़दार हैं. उन्होंने कहा, "ज़्यादातर विधवाएं महसूस करती हैं कि यही अल्लाह की मर्ज़ी है और उन्हें अपने परिवार की बात माननी ही होगी."


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