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श्रीलंका ने आईएमएफ़ से क़र्ज़ माँगा

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श्रीलंका ने आईएमएफ़ से क़र्ज़ माँगा

दुनिया भर में मंदी के असर से श्रीलंका भी नहीं बच सका है. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के बाद श्रीलंका दूसरा देश है जिसे अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने के लिए आईएमएफ़ से गुहार लगानी पड़ी है.

वैश्विक आर्थिक संकट से श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव आया है और इससे गारमेंट, चाय और पर्यटन जैसे उद्योगों पर बुरा असर पड़ा है.

श्रीलंका में पिछले कुछ महीनों में कई फैक्ट्रियां बंद हुई हैं और हज़ारों की तादाद में लोग बेरोज़गार हुए हैं. यही नहीं पिछले चार महीने में देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी घटकर आधा रह गया है.

सरकार मज़बूर

विदेशी निवेश आकर्षित करने के क़दम बेअसर रहने के बाद श्रीलंका सरकार आईएमएफ़ से क़र्ज़ लेने को मजबूर हुई है.

आईएमएफ़ से क़र्ज़ मिलने में मुश्किल नहीं आनी चाहिए क्योंकि मौजूदा सरकार की नीतियां आईएमएफ़ के ख़िलाफ़ नहीं हैं गवर्नर, श्रीलंका सेंट्रल बैंक

आईएमएफ़ से क़र्ज़ मिलने में मुश्किल नहीं आनी चाहिए क्योंकि मौजूदा सरकार की नीतियां आईएमएफ़ के ख़िलाफ़ नहीं हैं

सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवाद कबराल का कहना है कि आईएमएफ़ से मिलने वाली रक़म का इस्तेमाल उत्तर और पूर्वी प्रांत के पुनर्निर्माण पर किया जाएगा. श्रीलंका सेना और तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के बीच हाल में हुए संघर्ष में इन प्रांतों में भारी नुक़सान हुआ है.

बैंक का कहना है की क़र्ज़ के लिए आईएमएफ़ से बातचीत जारी है और इस महीने के अंत तक बातचीत खत्म होने की उम्मीद है.

सेंट्रल बैंक के गवर्नर ने बीबीसी से कहा, "आईएमएफ़ से क़र्ज़ मिलने में मुश्किलें आने की संभावना नहीं है क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि सरकार की मौजूदा नीतियां आईएमएफ़ के ख़िलाफ़ हैं."

श्रीलंका सरकार को एलटीईई के साथ युद्ध के बाद पुनर्निर्माण कार्यों के लिए बड़ी आर्थिक मदद की ज़रूरत होगी.

हालाँकि अभी युद्ध ख़त्म नहीं हुआ है और श्रीलंका सेना उत्तर-पूर्व में तमिल विद्रोहियों से लड़ रही है.

दशकों से अलग तमिल देश के लिए लड़ रही एलटीटीई ने देश के उत्तर और पूर्व में नियंत्रण कर रखा था जहाँ उसके आदेश-निर्देश का पालन होता था.

लेकिन ताज़ा लड़ाई के बाद विद्रोहियों का कब्ज़ा अधिकतर जगहों से हट गया है. श्रीलंका की सरकार ने घोषणा की है कि जब तक एलटीटीई आत्मसमर्पण नहीं करती तब तक लड़ाई जारी रहेगी.

लगभग ढाई दशक से चल रहे इस विद्रोह में दोनों पक्षों के कम से कम 70 हज़ार लोग मारे गए हैं.

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